आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी आलोचना और साहित्येतिहास के सबसे बड़े नामों में गिने जाते हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य को कालों में बाँटकर, प्रवृत्तियों के आधार पर समझने की जो पद्धति दी, वह आज भी पाठ्यक्रमों और प्रतियोगी परीक्षाओं की रीढ़ है। उनकी पुस्तक हिंदी साहित्य का इतिहास के बिना हिंदी साहित्य की पढ़ाई की कल्पना करना कठिन है।
शुक्ल जी केवल इतिहासकार नहीं थे। वे निबंधकार, आलोचक, अनुवादक, संपादक, कोशकार और कवि भी थे। इस लेख में उनके जीवन, शिक्षा, कार्य, रचनाओं, भाषा-शैली और साहित्य में स्थान को सरल भाषा में समझाया गया है, साथ में परीक्षा के लिए उपयोगी बिंदु और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न भी दिए गए हैं।
रामचंद्र शुक्ल का जीवन परिचय: एक नज़र में
| पूरा नाम | आचार्य रामचंद्र शुक्ल |
| जन्म | 4 अक्टूबर 1884, अगोना गाँव, बस्ती ज़िला, उत्तर प्रदेश |
| पिता | चंद्रबली शुक्ल, जो राजस्व विभाग में कानूनगो थे |
| माता | विभाषी (हिंदी विकिपीडिया के अनुसार); जब वे नौ वर्ष के थे तब माता का निधन हो गया |
| शिक्षा | मिर्ज़ापुर के लंदन मिशन स्कूल से 1901 में स्कूल की अंतिम परीक्षा; आगे वकालत पढ़ने इलाहाबाद गए, पर साहित्य में रुचि के कारण उसमें सफल नहीं हुए |
| पत्नी | सावित्री देवी |
| कार्यक्षेत्र | काशी नागरी प्रचारिणी सभा से जुड़े; बाद में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष |
| साहित्यिक पहचान | इतिहासकार, आलोचक, निबंधकार, अनुवादक, संपादक |
| सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ | हिंदी साहित्य का इतिहास, चिंतामणि |
| भाषा | परिष्कृत, तत्सम प्रधान खड़ी बोली |
| निधन | 2 फ़रवरी 1941, काशी (वाराणसी); हृदय गति रुकने से |
बचपन और शिक्षा
रामचंद्र शुक्ल का जन्म 4 अक्टूबर 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के अगोना गाँव में हुआ। उनके पिता चंद्रबली शुक्ल की नियुक्ति मिर्ज़ापुर में सदर कानूनगो के पद पर हुई, इसलिए पूरा परिवार वहीं आकर रहने लगा। जब शुक्ल नौ वर्ष के थे, तब माता का देहांत हो गया। माँ के सुख से वंचित होने और विमाता के व्यवहार ने उन्हें कम उम्र में ही गंभीर और परिपक्व बना दिया।
पढ़ाई के प्रति उनकी लगन बचपन से थी। मिर्ज़ापुर के लंदन मिशन स्कूल से उन्होंने 1901 में स्कूल की अंतिम परीक्षा उत्तीर्ण की। पिता चाहते थे कि बेटा कचहरी में काम सीखे, पर शुक्ल उच्च शिक्षा चाहते थे। इसलिए उन्हें वकालत पढ़ने इलाहाबाद भेजा गया। वहाँ उनका मन कानून की जगह साहित्य में रमा रहा और वे उसमें सफल नहीं हो सके। पिता ने नायब तहसीलदारी दिलाने की कोशिश भी की, पर उनकी स्वाभिमानी प्रकृति के कारण यह रास्ता भी नहीं बन सका। यही असफलताएँ अंततः उन्हें साहित्य के पूर्णकालिक मार्ग पर ले आईं।
सुनी-सुनाई बातों में कई जगह यह लिखा मिलता है कि उनकी पढ़ाई आर्थिक या स्वास्थ्य कारणों से रुकी, पर प्रमुख स्रोत इसकी जगह रुचि के अंतर को कारण बताते हैं, इसलिए यहाँ वही लिखा गया है।
कार्यक्षेत्र और व्यावसायिक जीवन
सन् 1903 से 1908 तक उन्होंने आनंद कादंबिनी पत्रिका में सहायक संपादक का काम किया। 1904 से 1908 तक वे मिर्ज़ापुर के लंदन मिशन स्कूल में ड्रॉइंग के अध्यापक भी रहे। इन्हीं वर्षों में उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे और उनकी विद्वत्ता की चर्चा फैलने लगी।
उनकी योग्यता से प्रभावित होकर 1908 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें हिंदी शब्दसागर के सहायक संपादक का दायित्व सौंपा। यह हिंदी का बृहद् शब्दकोश-कार्य था, जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक पूरा कराया। श्यामसुंदर दास ने भी शब्दसागर की उपयोगिता का बहुत बड़ा श्रेय शुक्ल जी को दिया। वे नागरी प्रचारिणी पत्रिका के संपादक भी रहे।
1919 के आसपास वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए। श्यामसुंदर दास के निधन के बाद 1937 से जीवन के अंतिम वर्ष 1941 तक वे विभागाध्यक्ष रहे। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार उनके विभागाध्यक्ष बनने का समय पंडित मदन मोहन मालवीय के कार्यकाल के दौरान था।
व्यक्तिगत जीवन और निधन
उनका विवाह सावित्री देवी से हुआ था। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार उनके दो पुत्र (केशव चंद्र और गोकुल चंद्र) और तीन पुत्रियाँ (दुर्गावती, विद्या और कमला) थीं। वे चित्रकला में भी रुचि रखते थे और उन्होंने अपना घर स्वयं डिज़ाइन किया था, जो उनके निधन के समय अधूरा रह गया था।
2 फ़रवरी 1941 को हृदय की गति रुक जाने से उनका निधन हो गया। उनकी स्मृति में 1972 में "आचार्य रामचंद्र शुक्ल साहित्य शोध संस्थान" की स्थापना हुई, जो वाराणसी में साहित्यिक शोध का केंद्र है।
रामचंद्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएँ
शुक्ल जी की रचनाओं को मौलिक, अनूदित और संपादित, इन तीन वर्गों में देखा जाता है।
मौलिक रचनाएँ
- हिंदी साहित्य का इतिहास (लगभग 1928-29): हिंदी साहित्य के काल-विभाजन और विकास का सबसे चर्चित ग्रंथ। इसमें साहित्य को सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों और प्रवृत्तियों से जोड़कर देखा गया है।
- चिंतामणि: उनके प्रसिद्ध निबंधों का संग्रह। पहले भाग के निबंध पहले "विचार वीथी" नाम से 1930 में छपे थे। बाद में अन्य विद्वानों ने उनके बिखरे निबंध जोड़कर भाग तीन और चार भी प्रकाशित किए। इसमें क्रोध, घृणा, करुणा जैसे मनोविकारों पर लिखे निबंध शामिल हैं।
- रस मीमांसा: काव्यशास्त्र और रस-सिद्धांत पर गंभीर आलोचनात्मक पुस्तक।
- गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास और जायसी पर समीक्षाएँ: भक्तिकालीन कवियों की व्यावहारिक आलोचना के प्रतिमान।
- काव्य में रहस्यवाद, काव्य में अभिव्यंजनावाद: काव्य-सिद्धांत संबंधी निबंध।
- कविता क्या है?: प्रसिद्ध निबंध, जो पहली बार 1909 में सरस्वती पत्रिका में छपा बताया जाता है।
- मित्रता, अध्ययन, क्रोध जैसे निबंध: जीवनोपयोगी विषयों पर लिखे गए, जो पाठ्यपुस्तकों में बहुत पढ़े जाते हैं।
- मधुस्रोत: उनका कविता-संग्रह, जिसमें प्रकृति-प्रेम की रचनाएँ हैं।
- ग्यारह वर्ष का समय: उनकी लिखी कहानी, जो हिंदी की प्रारंभिक मौलिक कहानियों की चर्चा में आती है।
अनूदित रचनाएँ
- शशांक: बंगला उपन्यास का हिंदी अनुवाद।
- विश्वप्रपंच: जर्मन विद्वान अर्न्स्ट हेकेल की पुस्तक का अनुवाद, जिसमें उन्होंने भारतीय दर्शन से तुलना करती अपनी भूमिका जोड़ी।
- बुद्धचरित: एडविन आर्नल्ड की Light of Asia का ब्रजभाषा पद्य में रूपांतर।
- आदर्श जीवन, कल्पना का आनंद, मेगस्थनीज का भारतवर्षीय वर्णन: अंग्रेज़ी स्रोतों से अनुवाद।
संपादित कृतियाँ
- हिंदी शब्दसागर और नागरी प्रचारिणी पत्रिका।
- भ्रमरगीत सार: सूरदास के भ्रमरगीत पदों का संपादन, भूमिका सहित।
- तुलसी ग्रंथावली और जायसी ग्रंथावली: मूल पाठ के संपादन के साथ विस्तृत भूमिकाएँ।
हिंदी साहित्य के इतिहास की विशेषता
शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य के इतिहास को चार कालों में बाँटा, और यह विभाजन आज भी परीक्षाओं में पूछा जाता है। ये काल हैं: आदिकाल (वीरगाथाकाल), पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल), उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) और आधुनिक काल (गद्यकाल)। उनके अनुसार इनकी अवधि क्रमशः लगभग संवत् 1050 से 1375, 1375 से 1700, 1700 से 1900 और 1900 के बाद है।
उनकी पद्धति की सबसे बड़ी बात यह है कि वे कवियों को केवल नामों की सूची की तरह नहीं रखते, बल्कि उनकी प्रवृत्तियों, उनके समय की परिस्थितियों और उनकी काव्य-शक्ति का मूल्यांकन करते हैं। रामविलास शर्मा जैसे आलोचकों ने उनके इतिहास-दृष्टिकोण की इसी जनजीवन से जुड़ी दृष्टि को महत्त्वपूर्ण बताया है। इस पुस्तक में कबीर, सूरदास और तुलसी जैसे भक्तिकालीन कवियों से लेकर आधुनिक काल के निराला और प्रेमचंद तक का विवेचन मिलता है।
रामचंद्र शुक्ल की भाषा-शैली
शुक्ल जी की भाषा परिष्कृत और गठी हुई खड़ी बोली है। गंभीर आलोचनात्मक और खोजपूर्ण निबंधों में उसका स्वरूप तत्सम शब्दों से भरा, कठिन किंतु स्पष्ट मिलता है। इसके विपरीत मनोवैज्ञानिक निबंधों में उनकी भाषा सरल और व्यावहारिक हो जाती है, जिसमें प्रचलित हिंदी शब्द, कहीं-कहीं उर्दू-अंग्रेज़ी के चलते शब्द और लोकोक्तियाँ-मुहावरे भी आते हैं।
उनकी शैली के तीन मुख्य रूप माने जाते हैं:
- आलोचनात्मक शैली: गंभीर भाषा, तत्सम शब्द, छोटे और सधे हुए वाक्य।
- गवेषणात्मक शैली: खोज और विश्लेषण वाले निबंधों में; वाक्य बड़े और भाषा अपेक्षाकृत क्लिष्ट।
- भावात्मक शैली: मनोविकार संबंधी निबंधों में; गद्य-काव्य जैसा प्रवाह, और सूक्तियों जैसे वाक्य। उदाहरण के रूप में वे बैर को क्रोध के अचार-मुरब्बे जैसा कहते हैं, यानी लंबे समय तक सँजोया हुआ क्रोध।
इनके अलावा उनके गद्य में गागर में सागर जैसी कसावट, निगमन पद्धति, अलंकार और कहीं-कहीं हल्का व्यंग्य भी मिलता है।
साहित्यिक विशेषताएँ
- लोकमंगल की अवधारणा: उनके अनुसार काव्य का अंतिम लक्ष्य केवल आनंद नहीं, बल्कि समाज की भलाई और जीवन की क्रियाशीलता को बल देना है।
- रस और भाव पर ज़ोर: वे भाव या रस को काव्य की आत्मा मानते हैं।
- बिंबग्रहण पर बल: कवि का पहला काम पाठक को स्पष्ट चित्र का अनुभव कराना है।
- मनोवैज्ञानिक दृष्टि: क्रोध, घृणा और करुणा जैसे भावों की सामाजिक भूमिका का विश्लेषण।
- व्यावहारिक आलोचना: तुलसी, सूर और जायसी पर किए गए अध्ययन आलोचना के उच्च प्रतिमान बने।
- रहस्यवाद के प्रति सतर्क दृष्टि: वे लोकजीवन से कटी हुई धुंधली काव्य-प्रवृत्तियों के पक्षधर नहीं थे।
- बहुमुखी प्रतिभा: इतिहास, निबंध, अनुवाद, संपादन, कोश और कविता सभी में योगदान।
आधुनिक काल के अन्य निबंध-आलोचना से जुड़े साहित्यकारों को समझने के लिए जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और रामधारी सिंह दिनकर के जीवन परिचय भी पढ़ सकते हैं। ये सभी उस दौर के हैं जिसका मूल्यांकन शुक्ल जी की दृष्टि से होता रहा है।
साहित्य में स्थान और सम्मान
शुक्ल जी को हिंदी में वैज्ञानिक, पाठ-आधारित आलोचना का प्रवर्तक माना जाता है। इतिहास-लेखन में वे सबसे प्रामाणिक आधार-ग्रंथ देने वाले इतिहासकार हैं, और निबंध तथा आलोचना के क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा युगप्रवर्तक की है। इसीलिए उन्हें "आचार्य" कहा जाता है।
- "काव्य में रहस्यवाद" पर हिंदुस्तानी अकादमी से 500 रुपये का पुरस्कार (हिंदी विकिपीडिया के अनुसार)।
- "चिंतामणि" पर हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग का 1200 रुपये का मंगलाप्रसाद पारितोषिक।
परीक्षा के लिए याद रखने योग्य बातें
- जन्म: 4 अक्टूबर 1884, अगोना (बस्ती); निधन: 2 फ़रवरी 1941, वाराणसी।
- सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ: हिंदी साहित्य का इतिहास; निबंध-संग्रह: चिंतामणि।
- इतिहास के चार काल: आदिकाल (वीरगाथाकाल), पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल), उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल), आधुनिक काल।
- संपादन: हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भ्रमरगीत सार, तुलसी और जायसी ग्रंथावली।
- अनुवाद: शशांक, विश्वप्रपंच, बुद्धचरित, आदर्श जीवन।
- प्रमुख सिद्धांत: लोकमंगल; काव्य की आत्मा: भाव या रस।
- भाषा: तत्सम प्रधान खड़ी बोली; शैली: आलोचनात्मक, गवेषणात्मक, भावात्मक।
- BHU में विभागाध्यक्ष: 1937 से 1941 तक।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
रामचंद्र शुक्ल का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 4 अक्टूबर 1884 को उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के अगोना गाँव में हुआ था।
रामचंद्र शुक्ल की मृत्यु कब हुई?
उनका निधन 2 फ़रवरी 1941 को वाराणसी में हृदय गति रुकने से हुआ।
रामचंद्र शुक्ल की सबसे प्रसिद्ध रचना कौन-सी है?
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना हिंदी साहित्य का इतिहास है। निबंधों में उनका प्रसिद्ध संग्रह चिंतामणि है।
रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास को कितने कालों में बाँटा?
उन्होंने चार कालों में बाँटा: आदिकाल (वीरगाथाकाल), पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल), उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) और आधुनिक काल।
चिंतामणि क्या है?
चिंतामणि शुक्ल जी के निबंधों का संग्रह है, जिसमें क्रोध, घृणा और करुणा जैसे मनोविकारों तथा काव्य-संबंधी विचारों पर लिखे गए निबंध शामिल हैं।
रामचंद्र शुक्ल ने किन ग्रंथों का संपादन किया?
उन्होंने हिंदी शब्दसागर (सहायक संपादक), नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भ्रमरगीत सार तथा तुलसी और जायसी की ग्रंथावलियों का संपादन किया।
रामचंद्र शुक्ल की भाषा-शैली क्या है?
उनकी भाषा तत्सम प्रधान परिष्कृत खड़ी बोली है और शैली आलोचनात्मक, गवेषणात्मक तथा भावात्मक रूपों में मिलती है।
रामचंद्र शुक्ल काव्य में किस बात पर सबसे अधिक ज़ोर देते हैं?
वे लोकमंगल को काव्य का परम लक्ष्य मानते हैं और भाव या रस को काव्य की आत्मा। इसी के अनुसार वे कविता और कवियों का मूल्यांकन करते हैं।