रामधारी सिंह दिनकर को हिंदी में ‘राष्ट्रकवि’ के रूप में याद किया जाता है। उनकी कविता में ओज, स्वाभिमान और राष्ट्र-चेतना की गूँज है, और साथ ही प्रेम, सौंदर्य और दर्शन की गहराई भी। रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र और उर्वशी जैसी कृतियों ने उन्हें हिंदी के शीर्ष कवियों में खड़ा किया। नीचे परीक्षा के लिहाज़ से ज़रूरी तथ्य एक जगह दिए गए हैं, उसके बाद उनके जीवन और साहित्य की कहानी।
रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय: एक नज़र में
| पूरा नाम | रामधारी सिंह ‘दिनकर’ |
| जन्म | 23 सितंबर 1908, सिमरिया गाँव (बेगूसराय, बिहार) |
| माता-पिता | पिता बाबू रवि सिंह और माता मनरूप देवी |
| शिक्षा | प्रारंभिक शिक्षा गाँव और आसपास के विद्यालयों में; मोकामा घाट के स्कूल से मैट्रिक; पटना कॉलेज से इतिहास में बी.ए. (ऑनर्स) |
| कार्यक्षेत्र | सब-रजिस्ट्रार, बिहार सरकार के प्रचार विभाग में सेवा, कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिंदी सलाहकार |
| राजनीतिक भूमिका | 1952 से 1964 तक राज्यसभा के सदस्य |
| काव्यधारा | राष्ट्रीय चेतना और ओज की कविता; छायावादोत्तर काल के प्रमुख कवि |
| प्रमुख रचनाएँ | रेणुका, हुंकार, रसवंती, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, संस्कृति के चार अध्याय |
| सम्मान | साहित्य अकादमी पुरस्कार (संस्कृति के चार अध्याय), पद्म भूषण (1959), ज्ञानपीठ पुरस्कार (उर्वशी, 1972) |
| निधन | 24 अप्रैल 1974 |
बचपन और शिक्षा
दिनकर का जन्म बिहार के बेगूसराय ज़िले के सिमरिया गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता का साया सिर से उठ गया और परिवार को आर्थिक तंगी झेलनी पड़ी। गाँव का परिवेश, गंगा का किनारा और किसानों का जीवन आगे चलकर उनकी कविता के बड़े विषय बने।
उन्होंने पढ़ाई में कठिनाइयों के बावजूद लगन दिखाई। आगे चलकर पटना कॉलेज से उन्होंने इतिहास में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इतिहास की यही समझ बाद में उनके गद्य और खासकर संस्कृति के चार अध्याय में साफ़ दिखाई देती है। साथ ही उन्होंने हिंदी के अलावा संस्कृत, उर्दू, बंगला और अंग्रेज़ी साहित्य का भी अध्ययन किया।
नौकरी, लेखन और सार्वजनिक जीवन
पढ़ाई पूरी करने के बाद दिनकर ने कुछ समय अध्यापन किया और फिर सरकारी सेवा में गए। वे सब-रजिस्ट्रार रहे और बाद में बिहार सरकार के प्रचार विभाग में काम किया। नौकरी के दौरान भी उनका लेखन चलता रहा और उनकी कविताएँ देश में चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष की भावना को आवाज़ देती रहीं।
स्वतंत्रता के बाद वे मुज़फ़्फ़रपुर के एक कॉलेज में हिंदी विभाग से जुड़े। 1952 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और लगभग बारह वर्ष तक इस पद पर रहे। इसके बाद वे भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने और फिर भारत सरकार के हिंदी सलाहकार के रूप में भी काम किया। संसद और सार्वजनिक मंचों पर वे अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते थे।
24 अप्रैल 1974 को उनका निधन हो गया। उनके जाने के बाद भी उनकी कविताएँ आंदोलनों, भाषणों और विद्यालयों की पाठ्यपुस्तकों में जीवित हैं।
दिनकर की प्रमुख रचनाएँ
| वर्ग | रचनाएँ |
| काव्य-संग्रह | रेणुका, हुंकार, रसवंती, द्वंद्वगीत, सामधेनी, धूप और धुआँ, नील कुसुम, परशुराम की प्रतीक्षा |
| प्रबंध-काव्य | कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी |
| गद्य और निबंध | संस्कृति के चार अध्याय, अर्धनारीश्वर, मिट्टी की ओर, रेती के फूल, उजली आग |
| बाल साहित्य और अन्य | मिर्च का मज़ा तथा कुछ बाल-रचनाएँ और आलोचनात्मक लेख |
रश्मिरथी में कर्ण के जीवन को केंद्र में रखकर सामाजिक न्याय, जन्म और कर्म के सवाल उठाए गए हैं। कुरुक्षेत्र महाभारत के युद्ध के बहाने युद्ध और शांति पर चिंतन करता है। उर्वशी पुरुरवा और उर्वशी की कथा के माध्यम से प्रेम, काम और अध्यात्म का द्वंद्व रचती है, और इसी कृति पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला।
पुरस्कार और सम्मान
संस्कृति के चार अध्याय पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला, जो भारतीय संस्कृति की एकता और विविधता पर लिखी गई महत्त्वपूर्ण गद्य-कृति है। 1959 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया और 1972 में उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। हिंदी साहित्य में उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से जाना जाता है।
दिनकर की भाषा-शैली
दिनकर की भाषा खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की गरिमा और बोलचाल की सहजता दोनों मिलती हैं। ओजपूर्ण विषयों में उनकी भाषा तेज़ और प्रवाहमयी हो जाती है, जबकि प्रेम और सौंदर्य के प्रसंगों में कोमल और संगीतमय।
उनकी शैली में भाषण जैसी प्रभावशाली लय है, जो पाठक या श्रोता को बाँध लेती है। उन्होंने उपमा, रूपक और प्रतीकों का स्वाभाविक प्रयोग किया है, और इतिहास तथा पुराण के पात्रों के सहारे आधुनिक प्रश्न उठाए हैं। यही कारण है कि उनकी कविता मंच पर भी असरदार लगती है और पन्नों पर भी।
साहित्यिक विशेषताएँ
- राष्ट्रीय चेतना: उनकी कविता देश के स्वाभिमान, स्वतंत्रता और जन-जागरण की बात करती है।
- वीर रस और ओज: उनके काव्य का प्रमुख स्वर ओजपूर्ण है, जो पाठक में उत्साह जगाता है।
- सामाजिक न्याय की चिंता: किसान, मज़दूर और उपेक्षित वर्ग की पीड़ा उनके काव्य में जगह पाती है।
- इतिहास और पुराण का आधुनिक पाठ: महाभारत और पुरुरवा-उर्वशी की कथाओं के सहारे उन्होंने समकालीन सवाल उठाए।
- प्रेम और सौंदर्य का दूसरा पक्ष: रसवंती और उर्वशी में उनका कोमल, श्रृंगारिक और दार्शनिक रूप सामने आता है।
- गद्य में विचारशीलता: संस्कृति के चार अध्याय जैसी कृतियाँ उन्हें गंभीर चिंतक और इतिहास-दृष्टि वाला लेखक सिद्ध करती हैं।
परीक्षा के लिए याद रखने योग्य बातें
- दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को सिमरिया (बेगूसराय, बिहार) में हुआ और निधन 24 अप्रैल 1974 को।
- उनकी उपाधि ‘राष्ट्रकवि’ है और वे ओज के कवि माने जाते हैं।
- उर्वशी पर ज्ञानपीठ और संस्कृति के चार अध्याय पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
- इसी युग के अन्य कवियों को पढ़ें: जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय ज़िले के सिमरिया गाँव में हुआ था।
दिनकर को राष्ट्रकवि क्यों कहा जाता है?
उनकी कविताओं में राष्ट्रीय चेतना, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की भावना प्रबल है, इसलिए उन्हें राष्ट्रकवि कहा जाता है।
दिनकर की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, हुंकार, रेणुका और संस्कृति के चार अध्याय उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।
दिनकर को ज्ञानपीठ पुरस्कार किस रचना पर मिला?
उन्हें 1972 में उर्वशी के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।
दिनकर की भाषा-शैली कैसी है?
उनकी भाषा तत्सम प्रधान खड़ी बोली है, जिसमें ओज, प्रवाह और भाषण जैसी प्रभावशाली लय मिलती है।
दिनकर का निधन कब हुआ?
24 अप्रैल 1974 को उनका निधन हुआ।