जयशंकर प्रसाद हिंदी के उन रचनाकारों में हैं जिन्हें हर बोर्ड परीक्षा में पढ़ा जाता है। नीचे परीक्षा के लिहाज़ से ज़रूरी बातें एक जगह दी गई हैं, और उसके बाद उनके जीवन की पूरी कहानी।
जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय: एक नज़र में
| पूरा नाम | जयशंकर प्रसाद |
| जन्म | 30 जनवरी 1889, काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश |
| पिता | बाबू देवी प्रसाद (तंबाकू का पारिवारिक कारोबार, परिवार “सुँघनी साहू” नाम से जाना जाता था) |
| शिक्षा | स्कूल की पढ़ाई कम रही; घर पर संस्कृत, हिंदी, उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी का अध्ययन किया |
| मृत्यु | 15 नवंबर 1937, काशी (वाराणसी) |
| साहित्यिक पहचान | कवि, नाटककार, उपन्यासकार और कहानीकार; छायावाद के प्रमुख स्तंभ |
| सबसे प्रसिद्ध रचना | कामायनी (महाकाव्य, 1936) |
| भाषा | संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली (आरंभ में ब्रजभाषा) |
जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएँ
- काव्य: कामायनी, आँसू, लहर, झरना, चित्राधार
- नाटक: स्कंदगुप्त (1928), चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु, जनमेजय का नागयज्ञ
- उपन्यास: कंकाल, तितली
- कहानी संग्रह: आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल, प्रतिध्वनि
अगर आप दूसरे छायावादी कवियों को भी पढ़ रहे हैं, तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के जीवन परिचय भी देखें।
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,
बैठ शिला की शीतल छांह
एक पुरुष, भीगे नयनों से
देख रहा था प्रलय प्रवाह
नीचे जल था ऊपर हिम था,
एक तरल था एक सघन,
एक तत्व की ही प्रधानता
कहो उसे जड़ या चेतन
ये पक्तियां हैं हिंदी भाषा के महाकाव्य कामायनी की. कला की दृष्टि से कामायनी छायावादी काव्यकला का सबसे बेहतर प्रतीक माना जा सकता है. मानव प्रेम में समरसता का भाव कितना जरूरी है, ये महाकाव्य उसी का दर्शन कराती है और इस महाकाव्य को रचने वाले हैं सर्वश्रेष्ठ कहानियों के रचनाकार जयशंकर प्रसाद. असल मायनों में एक व्यक्ति कैसे परेशानियों से ऊपर उठकर उत्कृष्ट रचना कर सकता हैं इसका अच्छा उदाहरण हैं जयशंकर प्रसाद (Jaishankar Prasad Biography in Hindi). इन्होंने बचपन से लेकर अपनी मृत्यु तक संघर्षों में ही अपना जीवन बिताया. परिवार भी संभाला और साहित्य को भी इन्होंने भरपूर वक्त दिया. आखिर जयशंकर प्रसाद ने कैसे ये सब कुछ किया ये जानना भी जरूरी हो जाता है. आइए आपको बताते हैं इनका संपूर्ण जीवन परिचय!
कुछ ऐसा रहा जयशंकर प्रसाद का बचपन – Jaishankar Prasad Biography in Hindi
वो साल था 1889 का जब ईश्वर का शहर कहे जाने वाले वाराणसी में जयशंकर प्रसाद का जन्म हुआ. पिता देवीप्रसाद साहू तम्बाकू का व्यापार करते थे. पैसों और सुख-सुविधाओं की घर में कोई कमी नहीं थी. बचपने से ही जयशंकर पढ़ाई-लिखाई में मन लगाने लगे. पिता इज्जतदार व्यक्ति थे, लिहाजा घर पर विद्वान आते-जाते थे और इसका प्रभाव इन पर भी पड़ा. घर पर ही प्रसाद जी पढ़ाई करते थे. अलग-अलग भाषाओं के लिए अलग-अलग शिक्षक पढ़ाने आते थे. संस्कृत, उर्दू, हिंदी और फारसी भाषा को सीखने का काम उस वक्त जारी था. भाषा का ज्ञान हासिल करने के बाद उन्हें क्वीन्स कॉलेज भेज दिया गया. यहां वो 8वीं क्लास तक पढ़े.
जब जीवन में आया अहम मोड़ – Jaishankar Prasad Biography in Hindi
किसी भी व्यक्ति के जीवन में पिता का बहुत महत्व होता है. प्रसाद के जीवन में भी था, लेकिन बहुत ज्यादा दिनों तक उन्हें पिता का साथ नहीं मिल पाया. जब वो 12 साल के ही थे तभी पिता जी उन्हें छोड़कर स्वर्ग की यात्रा पर चले गए. इसके बाद घर में लड़ाई-झगड़ों का दौर शुरू हो गया और देखते ही देखते पूरा परिवार बिखर गया और पैसों की भी कमी देखने को मिलने लगी. पिता के देहान्त के 3 सालों के अंदर ही माता जी भी स्वर्ग सिधार गईं. इसके बाद बड़े भाई ने काम संभाला लेकिन वो भी ज्यादा दिन जीवित नहीं रह पाए. इसके बाद सारी जिम्मेदारी जयशंकर के कंधों पर आ गई. 17 साल की उम्र में ही परिवार का बोझ वो संभालने लगे. इनका लगभग जीवन वाराणसी में ही बीता.
जयशंकर प्रसाद और उनकी रचनाएं – Jaishankar Prasad Biography in Hindi
वैसे तो जयशंकर प्रसाद ने कविता, उपन्यास, नाटक, निबंध सभी चीजें लिखीं लेकिन हर एक विधा में उनका कवि रूप जरूर दिखता था. जिस वक्त में जयशंकर ने उपन्यास या नाटक लिखे उस वक्त और भी साहित्यकार देश में थे लेकिन इनकी रचनाओं में भाषा, चरित्र-चित्रण सब कुछ सबसे अलग होता था. यही कारण रहा कि इनकी रचनाओं ने लोगों के दिलों में गहरी छाप छोड़ी. भाषा शैली और शब्द विन्यास के लिए प्रसाद को कई बार आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा लेकिन वो कभी भी पीछे नहीं हटे.
कामायनी, आंसू, लहर, झरना, चित्राधार, प्रेम पथिक, महाराणा का महत्व, कानन कुसुम. प्रसाद ने कुल 72 कहानियां लिखी हैं. कंकाल, इरावती और तितली नाम के तीन बड़े उपन्यास भी इन्होंने लिखे. इन तीनों उपन्यासों में गांव, नगर और प्रकृति का विशेष चित्रण है. 13 नाटक भी जयशंकर प्रसाद ने लिखे. स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जन्मेजय का नाग यज्ञ, राज्यश्री, कामना, एक घूंट नाम इनके नाटकों के नाम हैं. इनके नाटकों के बारे में कहा जाता है कि इन पर अभिनय नहीं हुआ. कई लोगों की ओर से कहा जाता है कि ये नाटक रंगमंच के हिसाब से नहीं लिखे गए. हालांकि फिर भी इनके कई नाटक सफलतापूर्वक अभिनीत हो चुके हैं.
उदार व्यक्तित्व के धनी थे प्रसाद – Jaishankar Prasad Biography in Hindi
जयशंकर प्रसाद की भाषा-शैली
प्रसाद जी की शुरुआती कविताएँ ब्रजभाषा में थीं, पर आगे चलकर उन्होंने खड़ी बोली को अपनाया और उसे गहरे भावों के लायक बनाया। उनकी भाषा में तत्सम (संस्कृत मूल के) शब्द ज़्यादा मिलते हैं। शैली को परीक्षा में आम तौर पर तीन रूपों में लिखा जाता है: भावात्मक, चित्रात्मक और विचारात्मक।
साहित्यिक विशेषताएँ
- छायावाद के प्रवर्तक: प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी वर्मा को छायावाद के चार स्तंभ कहा जाता है, और प्रसाद को इस धारा का आरंभकर्ता माना जाता है।
- भारतीय संस्कृति और इतिहास: उनके नाटक प्राचीन भारत के इतिहास और संस्कृति पर आधारित हैं।
- प्रकृति और मानव मन: कविताओं में प्रकृति का चित्रण भावनाओं के साथ जुड़ा रहता है।
- कामायनी का संदेश: बुद्धि, भाव और कर्म के संतुलन, यानी समरसता का विचार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जयशंकर प्रसाद का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 30 जनवरी 1889 को काशी (वाराणसी) में हुआ था।
जयशंकर प्रसाद की सबसे प्रसिद्ध रचना कौन सी है?
कामायनी, जिसे आधुनिक हिंदी का श्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है।
जयशंकर प्रसाद किस काव्यधारा के कवि थे?
वे छायावाद के प्रमुख कवि थे और इस धारा के प्रवर्तकों में गिने जाते हैं।
जयशंकर प्रसाद के प्रमुख नाटक कौन से हैं?
स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु और जनमेजय का नागयज्ञ।
जयशंकर प्रसाद का निधन कब हुआ?
15 नवंबर 1937 को, केवल 47 वर्ष की आयु में।