मीराबाई भक्तिकाल की सबसे लोकप्रिय कवयित्रियों में से एक हैं। कृष्ण को अपना आराध्य ही नहीं, अपना पति मानकर उन्होंने जो पद गाए, वे पाँच सौ वर्ष बाद भी भजन के रूप में हर घर में गूँजते हैं। राजपरिवार की बेटी और बहू होकर भी उन्होंने लोक-लाज की परवाह किए बिना साधु-संतों के बीच कीर्तन किया, और यही साहस उन्हें भक्ति आंदोलन की एक अलग पहचान देता है।
मीराबाई के जीवन के बारे में सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि उनके समय के प्रामाणिक अभिलेख बहुत कम हैं। उनकी कथा का बड़ा हिस्सा परंपरा, किंवदंतियों और बाद के ग्रंथों पर टिका है। इसलिए इस लेख में जहाँ तथ्य पक्के हैं वहाँ सीधे बताया गया है, और जहाँ विद्वानों में मतभेद है वहाँ "मान्यता" शब्द के साथ लिखा गया है। परीक्षा की दृष्टि से भी यह अंतर समझना उपयोगी है।
मीराबाई का जीवन परिचय: एक नज़र में
| पूरा नाम | मीराबाई (मीरा); कुछ स्रोतों में बचपन का नाम अलग-अलग बताया जाता है |
| जन्म | मान्यता के अनुसार लगभग 1498 ई. (संवत् 1555 के आसपास); तिथि पर विद्वानों में मतभेद है, कुछ स्रोत 1499 भी लिखते हैं |
| जन्मस्थान | मान्यता है कि कुड़की (मारवाड़, राजस्थान); बचपन मेड़ता में बीता। हिंदी विकिपीडिया जन्म भी मेड़ता में बताती है |
| पिता | रतन सिंह राठौड़; दादा राव दूदा, मेड़ता के शासक |
| विवाह | मान्यता के अनुसार लगभग 1516 ई. में मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से, जो राणा सांगा के पुत्र थे |
| काव्यधारा | भक्तिकाल, कृष्ण-भक्ति (सगुण भक्ति), माधुर्य भाव |
| भाषा | राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा, कुछ पदों में गुजराती का प्रभाव |
| प्रमुख रचनाएँ | मीराबाई की पदावली (पद-संग्रह); अन्य कई ग्रंथ उनके नाम से जोड़े जाते हैं पर प्रामाणिकता पर बहस है |
| निधन | मान्यता है कि लगभग 1547 ई. के आसपास द्वारका में (कुछ स्रोत 1546); यह भी परंपरा पर आधारित है |
जन्म, परिवार और बचपन
मीराबाई राठौड़ राजपूत परिवार में जन्मी थीं। उनके पिता रतन सिंह राठौड़ और दादा राव दूदा थे, जो मेड़ता के प्रसिद्ध शासक माने जाते हैं। अंग्रेज़ी विकिपीडिया में उनकी माता का नाम वीर कुँवर बताया गया है। जन्म-स्थान को लेकर दो मत हैं: एक मत कुड़की गाँव को मानता है, दूसरा सीधे मेड़ता को। इतना लगभग सर्वमान्य है कि उनका बचपन मेड़ता में बीता।
लोक-कथा के अनुसार बचपन में किसी साधु से मिली कृष्ण की मूर्ति या किसी बारात को देखकर बालिका मीरा ने पूछा था कि उसका दूल्हा कौन होगा, और उत्तर में माँ ने कृष्ण का नाम ले दिया। यह कथा लोकप्रिय ज़रूर है, पर इसका कोई समकालीन प्रमाण नहीं मिलता। इसे परंपरा के रूप में ही लेना चाहिए। यह कथा यह समझाने के काम आती है कि कृष्ण-भक्ति उनके मन में बहुत छोटी उम्र से गहरी बैठ गई थी।
विवाह, वैधव्य और संघर्ष
मान्यता के अनुसार मीरा का विवाह लगभग 1516 ई. में मेवाड़ के सिसोदिया राजपरिवार में राणा सांगा के पुत्र भोजराज से हुआ। युद्धों में घायल होने के बाद 1521 ई. के आसपास भोजराज का निधन हो गया। इसी दौर में बाबर के विरुद्ध खानवा के युद्ध (1527) के बाद उनके पिता और ससुर राणा सांगा की भी मृत्यु हो गई। इस प्रकार वे अल्प समय में कई आघातों से गुज़रीं।
पति की मृत्यु के बाद मीरा ने सांसारिक जीवन से मुँह मोड़कर साधु-संगति और कृष्ण-कीर्तन में खुद को डुबो लिया। परंपरा बताती है कि महलों की मर्यादा के विपरीत वे मंदिरों में जाकर भक्तों के सामने नाचती-गाती थीं, जो राजपरिवार को पसंद नहीं आया। राणा सांगा के बाद विक्रम सिंह मेवाड़ के शासक बने और लोक-कथाओं में उन्हीं पर मीरा को कष्ट देने के आरोप लगते हैं।
प्रसिद्ध किंवदंतियों में विष का प्याला भेजना, फूलों की जगह साँप की टोकरी भेजना और जल में डूबने के लिए कहना शामिल हैं। हर कथा में चमत्कार से मीरा बच जाती हैं। इतिहासकार इन कथाओं को शब्दशः सत्य नहीं मानते। नैंसी मार्टिन जैसे विद्वानों का मत है कि मीरा को जो विरोध झेलना पड़ा, उसके पीछे धार्मिक या सामाजिक कारणों से अधिक उस काल की राजनीतिक अस्थिरता और युद्धों की भूमिका रही होगी। फिर भी इस पर सब सहमत हैं कि वे अपनी राह पर अडिग रहीं।
तीर्थयात्रा और अंतिम समय
मेवाड़ छोड़ने के बाद मान्यता है कि वे वृंदावन और फिर द्वारका गईं। अपने अंतिम वर्ष उन्होंने द्वारका में बिताए, जहाँ परंपरा के अनुसार वे लगभग 1547 ई. में कृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गईं। विद्वान इस चमत्कार को ऐतिहासिक साक्ष्य के अभाव में स्वीकार नहीं करते, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि उन्होंने जीवन भर कृष्ण को ही अपना पति माना और भक्ति के पद रचे।
गुरु रैदास की मान्यता
कई स्रोत संत रैदास (रविदास) को मीरा का गुरु बताते हैं। चित्तौड़ में रैदास के चरण-चिह्न वाली छतरी की बात भी कही जाती है, और मीरा के नाम से जुड़े कुछ पदों में गुरु-स्मरण मिलता है। लेकिन अंग्रेज़ी विकिपीडिया स्पष्ट लिखती है कि इस संबंध का कोई पुष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। इसलिए इसे विद्वानों में मतभेद का विषय मानकर "मान्यता" के रूप में याद रखें। इसी तरह अकबर और तानसेन के मीरा से मिलने की कथा भी संदिग्ध है, क्योंकि तानसेन 1562 ई. में अकबर के दरबार में आए, यानी मीरा के निधन के बाद।
मीराबाई की प्रमुख रचनाएँ
सबसे पहले एक ज़रूरी बात। मीरा की कविता उनके जीवनकाल में लिखित रूप में सुरक्षित नहीं मिलती। उनकी केवल दो रचनाओं का सबसे पुराना लिखित रूप 18वीं सदी के आरंभ का माना जाता है, और पदों का बड़ा संग्रह 19वीं सदी की पांडुलिपियों में मिलता है। हज़ारों पद उनके नाम से प्रचलित हैं, पर विद्वान मानते हैं कि इनमें से कितने वास्तव में उनके हैं, इस पर एकमत नहीं हैं। संभव है कि बाद के भक्तों ने भी उनके नाम से पद रचे हों।
- मीराबाई की पदावली: उनके गेय पदों का सबसे प्रसिद्ध संग्रह, जिसमें कृष्ण-प्रेम, विरह, समर्पण और संसार से विराग के पद हैं। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी द्वारा संपादित "मीराबाई की पदावली" इसका प्रमुख आधुनिक संस्करण मानी जाती है।
- नरसी जी रो माहेरो (नरसी जी का मायरा): परंपरा से मीरा से जुड़ी रचना, जिसमें भक्त नरसी मेहता की कथा है; प्रामाणिकता पर बहस है।
- राग गोविंद: उनके नाम से बताई जाने वाली रचना; विद्वानों में इसकी प्रामाणिकता पर मतभेद है।
- गोविंद टीका: कुछ परंपराएँ इसे गीत-गोविंद की टीका से जोड़ती हैं; यह भी विवादित है।
- राग सोरठा और मीरा की मल्हार: रागों के आधार पर संकलित पद-संग्रह, जिन्हें उनके नाम से जोड़ा जाता है।
- गर्वागीत और फुटकर पद: गरबा-शैली के गीत और बिखरे हुए पद, जो अलग-अलग संग्रहों में मिलते हैं।
उनके सबसे लोकप्रिय भजनों में "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो" का नाम आता है। इसके अलावा गिरधर गोपाल को संबोधित पद, विरह के पद और संसार से मोहभंग वाले पद भी बहुत गाए जाते हैं। पदों में प्रायः "मीरा के प्रभु गिरधर नागर" जैसी छाप मिलती है, जो उनकी पहचान बन गई है।
मीराबाई की भाषा-शैली
मीरा के पदों की भाषा मूलतः राजस्थानी है जिसमें ब्रजभाषा का गहरा मिश्रण है, और गुजराती के शब्द-रूप भी कहीं-कहीं मिलते हैं। इसका कारण यह माना जाता है कि वे राजस्थान, ब्रज और गुजरात के बीच घूमीं और उनके पद लोकगायकों के मुँह से एक प्रांत से दूसरे प्रांत तक पहुँचे। भाषा में व्याकरण की कठोरता कम और संगीत की सहजता अधिक है।
शैली के स्तर पर उनके पद गेय हैं। इनमें रागों का निर्देश मिलता है, इसलिए वे पढ़ने से अधिक गाने के लिए बने हैं। भाव की तीव्रता, सीधी आत्मीयता, उलाहना और समर्पण का मेल उनकी शैली की पहचान है। अलंकार स्वाभाविक रूप से आते हैं, जबकि पांडित्य प्रदर्शन नहीं मिलता।
साहित्यिक विशेषताएँ
- माधुर्य भक्ति: कृष्ण को प्रियतम और पति के रूप में देखना उनके काव्य का केंद्र है।
- विरह की तीव्रता: मिलन की आकांक्षा, प्रतीक्षा और पीड़ा के पद सबसे मार्मिक माने जाते हैं।
- आत्मसमर्पण: "गिरधर नागर" को एकमात्र आश्रय मानने का भाव बार-बार आता है।
- सामाजिक बंधनों की अवहेलना: कुल की मर्यादा, पर्दा और लोक-लाज के सामने झुकने से इनकार।
- प्रकृति के प्रतीक: बादल, मोर, कोयल और वर्षा के चित्र विरह की अनुभूति गहराते हैं।
- संगीतात्मकता: राग-रागिनियों में बँधे पद, जो आज भी गायन-परंपरा में जीवित हैं।
- सगुण और निर्गुण का मेल: मुख्यतः सगुण कृष्ण-भक्ति होते हुए भी संत परंपरा का प्रभाव दिखता है।
भक्तिकाल के अन्य बड़े कवियों की तुलना के लिए सूरदास का जीवन परिचय और कबीर दास का जीवन परिचय पढ़ना उपयोगी रहेगा। आधुनिक युग में विरह और वेदना की कवयित्री के रूप में महादेवी वर्मा को "आधुनिक मीरा" कहा जाता है, इसे समझने के लिए महादेवी वर्मा का जीवन परिचय देखें।
साहित्य में स्थान
मीराबाई को भक्तिकाल की कृष्णाश्रयी शाखा की प्रमुख कवयित्री और हिंदी की सबसे प्रसिद्ध संत-कवयित्री माना जाता है। लगभग 1600 ई. के आसपास रचे गए नाभादास के भक्तमाल में उनका उल्लेख मिलता है, जो बताता है कि उस समय तक वे भक्त-परंपरा में प्रतिष्ठित हो चुकी थीं। चित्तौड़गढ़ में उनके नाम से मंदिर है और मेड़ता में मीरा महल उनकी स्मृति को सँजोता है।
उनकी लोकप्रियता केवल साहित्य तक सीमित नहीं रही। उन पर कई भाषाओं में फ़िल्में बनीं, जिनमें गुलज़ार की हिंदी फ़िल्म मीरा (1979) और एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी अभिनीत तमिल फ़िल्म मीरा (1945) प्रसिद्ध हैं। उनके जीवन से स्त्री की स्वतंत्र चेतना और आस्था के अधिकार का संदेश भी लिया जाता है।
परीक्षा के लिए याद रखने योग्य बातें
- काल: भक्तिकाल; शाखा: कृष्णाश्रयी (सगुण) भक्ति; भाव: माधुर्य भक्ति।
- जन्म: लगभग 1498 ई.; निधन: लगभग 1547 ई., द्वारका (तिथियाँ परंपरा-आधारित)।
- पति: भोजराज (राणा सांगा के पुत्र); पिता: रतन सिंह राठौड़।
- प्रमुख रचना: मीराबाई की पदावली; अन्य ग्रंथों की प्रामाणिकता विवादित।
- भाषा: राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा; शैली: गेय पद।
- आराध्य: गिरधर नागर (कृष्ण); पदों की छाप: "मीरा के प्रभु गिरधर नागर"।
- रस: शृंगार (विरह प्रधान) और भक्ति।
- रैदास को गुरु मानने की बात परंपरा है, ऐतिहासिक रूप से पुष्ट नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मीराबाई का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
मान्यता के अनुसार उनका जन्म लगभग 1498 ई. में राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में कुड़की (या मेड़ता) में हुआ था। सटीक तिथि और स्थान पर विद्वानों में मतभेद है।
मीराबाई की मृत्यु कब और कहाँ हुई?
परंपरा के अनुसार उनका निधन लगभग 1547 ई. में द्वारका (गुजरात) में हुआ। कुछ स्रोत 1546 बताते हैं। किंवदंती कहती है कि वे कृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गईं।
मीराबाई के पति कौन थे?
मान्यता के अनुसार उनका विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ था, जो राणा सांगा के पुत्र थे। भोजराज का निधन लगभग 1521 ई. में हुआ।
मीराबाई की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?
उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना मीराबाई की पदावली है। इसके अलावा नरसी जी रो माहेरो, राग गोविंद, गोविंद टीका, राग सोरठा और मीरा की मल्हार उनके नाम से जोड़ी जाती हैं, पर इनकी प्रामाणिकता पर बहस है।
मीराबाई किस भाषा में लिखती थीं?
उनके पद मुख्यतः राजस्थानी भाषा में हैं, जिसमें ब्रजभाषा का मिश्रण है। कुछ पदों में गुजराती का प्रभाव भी दिखता है।
मीराबाई किसकी भक्त थीं?
वे भगवान कृष्ण की भक्त थीं और उन्हें "गिरधर नागर" कहकर पुकारती थीं। उनकी भक्ति को माधुर्य भाव की भक्ति कहा जाता है।
क्या रैदास मीराबाई के गुरु थे?
कई परंपराओं और कुछ स्रोतों में ऐसा कहा जाता है, लेकिन इसका ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। इसलिए इसे विद्वानों में मतभेद वाली मान्यता के रूप में देखा जाता है।
मीराबाई को आधुनिक युग में किससे जोड़कर देखा जाता है?
महादेवी वर्मा की वेदना-प्रधान कविता के कारण उन्हें "आधुनिक मीरा" कहा जाता है। दोनों में प्रेम, विरह और आत्मसमर्पण का साम्य देखा गया है।