नागार्जुन हिंदी और मैथिली के उन विरल कवियों में हैं जिन्हें लोग प्यार से ‘बाबा नागार्जुन’ और ‘जनकवि’ कहते हैं। वे खेत-खलिहान की बोली से लेकर संस्कृतनिष्ठ भाषा तक में लिखते थे, घुमक्कड़ थे, बौद्ध भिक्षु बने, किसान आंदोलनों में जेल गए और कविता को आम आदमी की आवाज़ बना दिया।
इस लेख में नागार्जुन का जीवन परिचय सरल भाषा में दिया गया है: असली नाम और उपनाम, जन्म और शिक्षा, बौद्ध धर्म की ओर झुकाव, राजनीतिक सक्रियता, प्रमुख कविताएँ और उपन्यास, पुरस्कार और परीक्षा में काम आने वाले बिंदु। एक ज़रूरी बात पहले ही: उनकी जन्मतिथि को लेकर स्रोतों में मतभेद है, इसलिए हमने उसे स्पष्ट रूप से अलग लिखा है।
नागार्जुन: एक नज़र में (Quick Facts)
| असली नाम | वैद्यनाथ मिश्र |
|---|---|
| उपनाम / कलम नाम | नागार्जुन (हिंदी), यात्री (मैथिली), वैदेह (काशी के दिनों में) |
| जन्म वर्ष | 1911 (तिथि पर मतभेद: कुछ स्रोतों में 30 जून 1911, जबकि उनकी स्वयं मानी हुई तिथि ज्येष्ठ पूर्णिमा के आधार पर 11 जून 1911) |
| जन्म स्थान | सतलखा गाँव (मधुबनी, बिहार) — ननिहाल; पैतृक गाँव तरौनी, दरभंगा |
| माता-पिता | उमा देवी और गोकुल मिश्र |
| निधन | 5 नवंबर 1998, ख़्वाजा सराय, दरभंगा, बिहार (उम्र 87 वर्ष) |
| भाषाएँ | हिंदी, मैथिली, संस्कृत, बांग्ला |
| साहित्यिक धारा | प्रगतिवाद |
| प्रमुख कृतियाँ | युगधारा, बलचनमा, पत्रहीन नग्न गाछ, रतिनाथ की चाची, वरुण के बेटे |
| प्रमुख सम्मान | साहित्य अकादमी पुरस्कार (मैथिली, 1969), साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप, भारत भारती सम्मान |
नागार्जुन का जन्म, परिवार और बचपन
नागार्जुन का मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनका जन्म 1911 में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन बिहार के मधुबनी ज़िले के सतलखा गाँव में उनके ननिहाल में हुआ। उनका पैतृक गाँव दरभंगा ज़िले का तरौनी था। पिता का नाम गोकुल मिश्र और माता का नाम उमा देवी था।
कहा जाता है कि उनसे पहले परिवार की कुछ संतानें जीवित नहीं रहीं, इसलिए बचपन में उन्हें ‘ठक्कन’ नाम से पुकारा गया। बाद में बाबा वैद्यनाथ की कृपा मानकर उनका नाम वैद्यनाथ मिश्र रखा गया। बहुत छोटी उम्र में माँ का साथ छूट गया और पिता की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। पिता उन्हें अपने साथ रिश्तेदारों के यहाँ ले जाते थे, और इसी तरह घूमने की आदत बचपन में ही पड़ गई, जो आगे चलकर उनके जीवन और कविता की पहचान बन गई।
जन्मतिथि पर मतभेद: हिंदी विकिपीडिया के अनुसार नागार्जुन स्वयं 1911 की ज्येष्ठ पूर्णिमा को अपना जन्मदिन मानते थे, जो पंचांग गणना से 11 जून 1911 बैठती है। लेकिन कुछ अन्य स्रोतों में 30 जून 1911 लिखा गया है। इसलिए परीक्षा या किसी आधिकारिक काम के लिए अपने पाठ्यक्रम या पुस्तक में दी गई तिथि ही लिखें।शिक्षा और बौद्ध धर्म की ओर यात्रा
नागार्जुन की शुरुआती पढ़ाई पारंपरिक ढंग से संस्कृत के ग्रंथों, जैसे ‘लघु सिद्धांत कौमुदी’ और ‘अमरकोश’ के सहारे हुई। बाद में वे संस्कृत की औपचारिक पढ़ाई के लिए बनारस गए। वहाँ उन पर आर्य समाज का प्रभाव पड़ा और फिर बौद्ध दर्शन की ओर झुकाव हुआ। उन्होंने पालि, प्राकृत और संस्कृत के साथ-साथ बांग्ला भी सीखी।
बनारस और कोलकाता होते हुए वे श्रीलंका (उस समय सिंहल) पहुँचे और वहाँ के विद्यालंकार परिवेण में बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यहीं उन्होंने ‘नागार्जुन’ नाम ग्रहण किया। इस मार्ग पर वे राहुल सांकृत्यायन को अपना बड़ा भाई जैसा मानते थे। श्रीलंका में रहते हुए उनकी रुचि विश्व राजनीति और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़ी। वे 1938 में भारत लौट आए।
राजनीतिक सक्रियता और जेल
नागार्जुन केवल कलम के कवि नहीं थे, वे सड़क पर उतरने वाले कवि भी थे। स्वामी सहजानंद सरस्वती से प्रभावित होकर उन्होंने बिहार के किसान आंदोलन में हिस्सा लिया। उन्हें इस दौरान पिटाई और जेल का सामना करना पड़ा। चंपारण के किसान आंदोलन में भी उनकी भागीदारी रही।
आपातकाल से पहले जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में भी वे शामिल हुए। हिंदी विकिपीडिया के अनुसार 1974 में आंदोलन के सिलसिले में उन्हें गिरफ़्तार किया गया और वे काफ़ी समय जेल में रहे। मार्क्सवाद और बौद्ध दर्शन, दोनों का असर उनकी सोच में दिखता है, इसीलिए उनकी कविताएँ गरीब, किसान, मज़दूर और वंचित वर्ग के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं।
लेखन की शुरुआत और भाषाएँ
नागार्जुन की पहली प्रकाशित रचना एक मैथिली कविता थी, जो 1929 में दरभंगा की पत्रिका ‘मिथिला’ में छपी। मैथिली में वे ‘यात्री’ नाम से लिखते थे। उनकी पहली हिंदी कविता ‘राम के प्रति’ 1934 में लाहौर से निकलने वाले साप्ताहिक ‘विश्वबंधु’ में प्रकाशित हुई। 1941 के बाद उन्होंने हिंदी में केवल ‘नागार्जुन’ नाम से लिखने का निर्णय लिया।
वे लगभग छह दशकों से अधिक समय तक रचनारत रहे। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, निबंध और बाल साहित्य, सभी में लेखन किया। उन्होंने कालिदास के ‘मेघदूत’ का मुक्तछंद में अनुवाद किया और जयदेव के ‘गीत गोविंद’ तथा विद्यापति के गीतों का भावानुवाद भी किया। बांग्ला में भी उन्होंने मौलिक कविताएँ लिखीं।
नागार्जुन की प्रमुख रचनाएँ
- कविता-संग्रह: युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, प्यासी पथराई आँखें, तालाब की मछलियाँ, तुमने कहा था, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, हज़ार-हज़ार बाँहों वाली, पुरानी जूतियों का कोरस, रत्नगर्भ, भूल जाओ पुराने सपने, अपने खेत में
- प्रबंध काव्य: भस्मांकुर, भूमिजा
- उपन्यास: रतिनाथ की चाची, बलचनमा, नयी पौध, बाबा बटेसरनाथ, वरुण के बेटे, दुखमोचन, कुंभीपाक, उग्रतारा, जमनिया का बाबा
- मैथिली रचनाएँ: चित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ (कविता), पारो, नवतुरिया (उपन्यास)
- संस्मरण: एक व्यक्ति: एक युग
- निबंध/आलेख: अन्नहीनम् क्रियाहीनम्, बम्भोलेनाथ
- बाल साहित्य: कथा मंजरी, मर्यादा पुरुषोत्तम, विद्यापति की कहानियाँ
चर्चित कविताओं में ‘बादल को घिरते देखा है’, ‘अकाल और उसके बाद’, ‘आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी’ और ‘मंत्र कविता’ का नाम बार-बार आता है। ‘बादल को घिरते देखा है’ पहाड़ों और प्रकृति का जीवंत शब्दचित्र है, जबकि कई अन्य कविताएँ राजनीति और व्यवस्था पर करारा तंज़ करती हैं।
नागार्जुन की काव्य-शैली और विशेषताएँ
- जनकवि की पहचान: उनकी कविता खेत, किसान, मज़दूर और आम इंसान के बहुत क़रीब है।
- भाषा का विस्तार: ठेठ देसी बोली से लेकर संस्कृतनिष्ठ शब्दावली तक, उनकी भाषा के कई स्तर हैं।
- छंद और शैली की विविधता: आलोचकों के अनुसार निराला के बाद इतने छंदों और काव्य-रूपों का प्रयोग करने वाले वे अकेले कवि हैं।
- व्यंग्य और प्रतिरोध: सत्ता, भ्रष्टाचार और अन्याय पर उनकी कविताओं में तीखा व्यंग्य है।
- प्रकृति और यात्रा: घुमक्कड़ी के अनुभव उनकी कविताओं में प्रकृति और लोकजीवन के चित्र बनकर आते हैं।
- आंचलिक उपन्यास: ‘बलचनमा’ और ‘वरुण के बेटे’ जैसे उपन्यासों को हिंदी में आंचलिक उपन्यास की परंपरा का आरंभिक काम माना जाता है।
नागार्जुन को प्रगतिवादी धारा का प्रमुख कवि माना जाता है। आप उसी दौर के अन्य कवियों को जानना चाहें तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और रामधारी सिंह दिनकर के जीवन परिचय भी देख सकते हैं।
पुरस्कार और सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1969): मैथिली कविता-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए (हिंदी विकिपीडिया के अनुसार; अंग्रेज़ी विकिपीडिया में एक जगह 1968 भी लिखा मिलता है)
- साहित्य अकादमी फ़ेलोशिप: साहित्य अकादमी का सर्वोच्च सम्मान
- भारत भारती सम्मान: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा
- मैथिलीशरण गुप्त सम्मान: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा
- राजेंद्र शिखर सम्मान (1994): बिहार सरकार द्वारा
मैथिली साहित्य में योगदान के कारण उन्हें आधुनिक मैथिली कविता का प्रमुख स्वर भी माना जाता है। हिंदी साहित्य के अन्य सम्मानित कवि मैथिलीशरण गुप्त के बारे में भी हमारा लेख उपयोगी रहेगा।
परिवार, स्वास्थ्य और निधन
स्रोतों के अनुसार उनका विवाह अपराजिता देवी से हुआ और परिवार में दो पुत्रियाँ तथा चार पुत्र थे। उन्हें 1948 में पहली बार दमे का दौरा पड़ा और जीवन भर यह समय-समय पर परेशान करता रहा। लगातार यात्राओं और आंदोलनों के कारण वे घर-परिवार को बहुत समय नहीं दे पाए।
नागार्जुन का निधन 5 नवंबर 1998 को बिहार के दरभंगा ज़िले के ख़्वाजा सराय में हुआ। उस समय उनकी उम्र 87 वर्ष थी। उनके नाम पर मिथिला विश्वविद्यालय परिसर में प्रतिमा भी लगी है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- असली नाम: वैद्यनाथ मिश्र; हिंदी में ‘नागार्जुन’, मैथिली में ‘यात्री’
- जन्म: 1911 (तिथि विवादित), सतलखा, मधुबनी; निधन: 5 नवंबर 1998
- काव्य धारा: प्रगतिवाद; उपाधि: जनकवि
- प्रमुख उपन्यास: बलचनमा (1952), रतिनाथ की चाची, नयी पौध, वरुण के बेटे
- साहित्य अकादमी पुरस्कार: ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ (मैथिली)
- बौद्ध दीक्षा: श्रीलंका, विद्यालंकार परिवेण, जहाँ ‘नागार्जुन’ नाम मिला
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
नागार्जुन का असली नाम क्या था?
नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था। हिंदी में वे ‘नागार्जुन’ और मैथिली में ‘यात्री’ नाम से लिखते थे।
नागार्जुन का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 1911 में बिहार के मधुबनी ज़िले के सतलखा गाँव (ननिहाल) में हुआ। उनका पैतृक गाँव दरभंगा ज़िले का तरौनी है। सटीक तारीख़ पर स्रोतों में मतभेद है: 11 जून या 30 जून 1911।
नागार्जुन की मृत्यु कब हुई और उम्र क्या थी?
उनका निधन 5 नवंबर 1998 को दरभंगा (बिहार) के ख़्वाजा सराय में हुआ। उस समय उनकी उम्र 87 वर्ष थी।
नागार्जुन को जनकवि क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उनकी कविताएँ किसान, मज़दूर और आम जनता के जीवन, संघर्ष और भाषा से जुड़ी हैं। वे सत्ता से सवाल करने वाले कवि थे और उन्होंने कविता को अभिजात दायरे से निकालकर जनता तक पहुँचाया।
नागार्जुन की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?
कविता में युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, पुरानी जूतियों का कोरस; उपन्यासों में बलचनमा, रतिनाथ की चाची, नयी पौध, वरुण के बेटे; और मैथिली में पत्रहीन नग्न गाछ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।
नागार्जुन को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस रचना पर मिला?
उन्हें मैथिली कविता-संग्रह ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उन्हें बाद में साहित्य अकादमी की सर्वोच्च फ़ेलोशिप भी दी गई।
नागार्जुन ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया?
संस्कृत और पालि के अध्ययन के दौरान उनका झुकाव बौद्ध दर्शन की ओर हुआ। वे श्रीलंका गए, वहाँ दीक्षा ली और इसी दौरान उन्हें ‘नागार्जुन’ नाम मिला। इस राह पर राहुल सांकृत्यायन उनके प्रेरक रहे।
‘बादल को घिरते देखा है’ किसकी कविता है?
‘बादल को घिरते देखा है’ बाबा नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता है, जिसमें हिमालय के प्राकृतिक दृश्यों का सजीव चित्रण मिलता है।