यशपाल का जीवन परिचय - क्रांतिकारी और हिंदी कथाकार

यशपाल का जीवन परिचय: क्रांतिकारी से कथाकार तक, रचनाएँ और पुरस्कार

यशपाल हिंदी कथा-साहित्य के उन लेखकों में हैं जिन्होंने पहले बंदूक और बम के रास्ते से आज़ादी की लड़ाई लड़ी और फिर कलम को अपना हथियार बनाया। उन्हें प्रेमचंद के बाद के सबसे महत्वपूर्ण कथाकारों में गिना जाता है। उनका उपन्यास ‘झूठा सच’ भारत-विभाजन की त्रासदी का विशाल दस्तावेज़ माना जाता है।

इस लेख में यशपाल का जीवन परिचय आसान हिंदी में दिया गया है: जन्म और शिक्षा, क्रांतिकारी जीवन, जेल और विवाह, लेखन की शुरुआत, प्रमुख उपन्यास और कहानी-संग्रह, पुरस्कार और परीक्षा के लिए ज़रूरी बातें। जहाँ स्रोतों में मतभेद मिला, वहाँ उसे साफ़ लिखा गया है।

यशपाल: एक नज़र में (Quick Facts)

पूरा नामयशपाल (यशपाल सिंह)
जन्म3 दिसंबर 1903
जन्म स्थानस्रोतों में अंतर: हिंदी विकिपीडिया में फ़िरोज़पुर छावनी (पंजाब), अंग्रेज़ी विकिपीडिया में कांगड़ा क्षेत्र का भूंपल गाँव
निधन26 दिसंबर 1976 (उम्र 73 वर्ष)
पेशाउपन्यासकार, कहानीकार, पत्रकार, क्रांतिकारी
साहित्यिक धाराप्रगतिवादी / मार्क्सवादी दृष्टि वाला कथा-साहित्य
क्रांतिकारी संगठनहिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)
जीवनसाथीप्रकाशवती कपूर
प्रसिद्ध रचनाएँझूठा सच, दिव्या, दादा कामरेड, देशद्रोही, मेरी तेरी उसकी बात, सिंहावलोकन
प्रमुख सम्मानदेव पुरस्कार (1955), पद्म भूषण (1970), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1976)

यशपाल का जन्म, परिवार और शिक्षा

यशपाल का जन्म 3 दिसंबर 1903 को हुआ। उनके जन्म-स्थान को लेकर स्रोत अलग-अलग बातें कहते हैं: हिंदी विकिपीडिया फ़िरोज़पुर छावनी लिखता है, जबकि अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार वे कांगड़ा की पहाड़ियों के भूंपल गाँव में जन्मे थे। इसलिए परीक्षा में वही लिखें जो आपकी पाठ्य-पुस्तक में दिया हो। इतना तय है कि उनका बचपन और पढ़ाई पंजाब में, फ़िरोज़पुर छावनी और लाहौर के आसपास बीती।

उनका परिवार गरीबी से जूझ रहा था और माँ ने बच्चों की परवरिश की। माँ आर्य समाज से प्रभावित थीं और चाहती थीं कि बेटा आर्य समाज के आदर्शों का प्रचारक बने, इसलिए उनकी आरंभिक शिक्षा आर्य समाज के गुरुकुल में हुई। यहीं उन्होंने अपनी निर्धनता की चुभन भी महसूस की। बाद में वे फ़िरोज़पुर छावनी लौटे और मैट्रिक में अपनी कक्षा में प्रथम आए।

महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन (1921-22) के समय वे कांग्रेस के प्रचार में सक्रिय रहे। बाद में लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ाई के लिए गए, जिसकी स्थापना लाला लाजपत राय ने की थी। वहीं उनका जीवन बदल गया।

क्रांतिकारी जीवन: भगत सिंह के साथी

लाहौर के नेशनल कॉलेज में यशपाल की मुलाक़ात भगत सिंह, सुखदेव और भगवतीचरण वोहरा जैसे साथियों से हुई। वे नौजवान भारत सभा की गतिविधियों में शामिल हुए और आगे चलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़ गए। असहयोग आंदोलन के स्थगन और गांधीवादी नीतियों से मोहभंग उन्हें सशस्त्र क्रांति की राह पर ले आया।

अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार 23 दिसंबर 1929 को वायसराय लॉर्ड इरविन की ट्रेन उड़ाने का प्रयास हुआ, जिसमें यशपाल ने बम का विस्फोट किया। ट्रेन का डाइनिंग कार नष्ट हुई, पर वायसराय बच गए। चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में संगठन के पुनर्गठन के बाद यशपाल को केंद्रीय समिति में लिया गया और वे पंजाब के संगठक बने।

फ़रवरी 1931 में चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के बाद यशपाल ने संगठन को फिर से एकजुट करने की कोशिश की और जनवरी 1932 में उन्हें कमांडर-इन-चीफ़ चुना गया। 22 जनवरी 1932 को इलाहाबाद में वे गिरफ़्तार हुए।

जेल, विवाह और रिहाई

गिरफ़्तारी के बाद यशपाल को 14 साल के सश्रम कारावास की सज़ा सुनाई गई। लेकिन वे छह साल बाद ही रिहा हो गए, क्योंकि उत्तर प्रदेश में नई कांग्रेस सरकार ने राजनीतिक कैदियों के लिए माफ़ी का समझौता किया। उनकी रिहाई 2 मार्च 1938 को हुई।

जेल के भीतर की एक घटना ख़ासतौर पर याद की जाती है। प्रकाशवती कपूर ने उनसे विवाह करने का निर्णय लिया और 7 अगस्त 1936 को बरेली सेंट्रल जेल में दोनों का विवाह हुआ। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार यह भारत की किसी जेल में हुआ पहला विवाह था, जिसके बाद जेल-नियमों में बदलाव किए गए।

रिहाई के बाद उन पर पंजाब में प्रवेश की पाबंदी थी, इसलिए वे पत्नी के साथ लखनऊ में बस गए और यहीं से उनकी साहित्यिक यात्रा शुरू हुई।

लेखन की शुरुआत: बुलेट से बुलेटिन तक

हिंदी विकिपीडिया के अनुसार रिहाई के बाद यशपाल ने 1938 में ‘विप्लव’ पत्रिका का प्रकाशन-संपादन शुरू किया और अपने इस काम को ‘बुलेट की जगह बुलेटिन’ बताया। उनका मानना था कि जो अधूरा काम राजनीतिक क्रांति से नहीं हो सका, उसे साहित्य के माध्यम से आगे बढ़ाया जाए।

उनका पहला कहानी-संग्रह ‘पिंजरे की उड़ान’ 1939 में प्रकाशित हुआ और उसे अच्छी सफलता मिली। इसके बाद ‘दादा कामरेड’ (1941) और ‘देशद्रोही’ (1943) जैसे उपन्यास आए, जिनमें साम्यवादी आंदोलन और वैचारिक संघर्ष केंद्र में थे। सरकार ने उनकी पत्रिका को राजद्रोही माना, इसलिए उन्हें ज़मानत जमा करने जैसे दबावों का सामना करना पड़ा। 1949 में उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने गिरफ़्तार भी किया, पर जनता के विरोध के बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा।

यशपाल की प्रमुख रचनाएँ

  • उपन्यास: दादा कामरेड (1941), देशद्रोही (1943), दिव्या (1945), पार्टी कामरेड (1946), मनुष्य के रूप (1949), अमिता (1956), झूठा सच (दो भाग: ‘वतन और देश’ 1958 व ‘देश का भविष्य’ 1960), बारह घंटे (1962), अप्सरा का शाप (1965), मेरी तेरी उसकी बात (1974)
  • कहानी-संग्रह: पिंजरे की उड़ान (1939), ज्ञानदान (1943), भस्मावृत चिनगारी, फूलों का कुर्ता, धर्मयुद्ध, उत्तमी की माँ, तुमने क्यों कहा था मैं सुंदर हूँ, सच बोलने की भूल, खच्चर और आदमी, भूख के तीन दिन
  • व्यंग्य-संग्रह: चक्कर क्लब, कुत्ते की पूँछ
  • आत्मकथा: सिंहावलोकन (तीन खंड, 1951-55), वे तूफ़ानी दिन
  • यात्रा-वृत्तांत: राह बीती, देखा सोचा समझा

अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार यशपाल ने हिंदी में 50 से अधिक कृतियाँ लिखीं, जिनमें से कई का अन्य भाषाओं में अनुवाद हुआ।

झूठा सच: यशपाल की सबसे बड़ी कृति

‘झूठा सच’ दो खंडों में लिखा गया उपन्यास है, जिसकी पृष्ठभूमि भारत-विभाजन है। इसके पहले भाग में लाहौर और विभाजन से पहले का वातावरण है, तो दूसरे भाग में आज़ादी के बाद नए भारत की उलझनें दिखती हैं। अनेक आलोचकों ने इसकी तुलना टॉल्स्टॉय के ‘वॉर एंड पीस’ से की है। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘This is Not That Dawn’ नाम से प्रकाशित हुआ।

‘दिव्या’ भी उनकी चर्चित कृति है, जो प्राचीन भारत के ऐतिहासिक परिवेश में रचा गया उपन्यास है। इसमें नारी की स्वतंत्रता और सम्मान का प्रश्न केंद्र में है। यशपाल के साहित्य में स्त्री-पुरुष समानता, क्रांति और प्रेम तीन बड़े सूत्र माने जाते हैं।

यशपाल की लेखन-शैली और विशेषताएँ

  • वैचारिक प्रतिबद्धता: उनका लेखन मार्क्सवादी दृष्टि से समाज को देखता है और शोषण, जाति और धार्मिक पाखंड पर चोट करता है।
  • यथार्थवाद: उनके पात्र आदर्श नायक नहीं, साधारण इंसान हैं, जिनमें कमज़ोरियाँ भी हैं।
  • स्त्री-दृष्टि: उनकी कहानियों में स्त्री को देह और मन में बाँटकर नहीं, संपूर्ण व्यक्ति के रूप में देखा गया।
  • प्रेमचंद की परंपरा: साहित्य अकादमी के लिए भीष्म साहनी ने उनकी कहानियों को प्रेमचंद की परंपरा का विस्तार माना, भले ही उनका फोकस शहरी समाज पर अधिक था।
  • सरल और प्रभावी भाषा: बोलचाल के क़रीब, तर्कपूर्ण और स्पष्ट भाषा।

प्रेमचंद की परंपरा को समझने के लिए आप हमारा लेख मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय भी पढ़ सकते हैं। प्रगतिवादी धारा के एक अन्य कवि के बारे में जानने के लिए सुमित्रानंदन पंत का जीवन परिचय देखें।

पुरस्कार और सम्मान

  • देव पुरस्कार (1955)
  • सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1969)
  • पद्म भूषण (1970)
  • मंगला प्रसाद पारितोषिक (1971)
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1976): उपन्यास ‘मेरी तेरी उसकी बात’ के लिए

यशपाल के जन्म के सौ वर्ष पूरे होने पर भारतीय डाक विभाग ने 3 दिसंबर 2003 को उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया।

निधन और साहित्यिक विरासत

यशपाल का निधन 26 दिसंबर 1976 को हुआ। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार वे उस समय अपनी आत्मकथा ‘सिंहावलोकन’ का चौथा खंड लिख रहे थे। उन्होंने भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के भीतर के मानवीय पक्ष को, यानी साथियों की ईर्ष्या, शंकाएँ और संघर्ष को भी ईमानदारी से दर्ज किया, जो हिंदी संस्मरण साहित्य में अनूठा है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु

  • जन्म: 3 दिसंबर 1903; निधन: 26 दिसंबर 1976
  • क्रांतिकारी संगठन: HSRA; भगत सिंह और सुखदेव के साथी
  • पत्रिका: विप्लव; प्रसिद्ध उपन्यास: झूठा सच, दिव्या, दादा कामरेड, देशद्रोही
  • आत्मकथा: सिंहावलोकन
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1976): मेरी तेरी उसकी बात
  • उन्हें प्रेमचंदोत्तर युग का प्रमुख कथाकार माना जाता है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

यशपाल का जन्म कब हुआ था?

यशपाल का जन्म 3 दिसंबर 1903 को हुआ था। जन्म-स्थान को लेकर स्रोतों में अंतर है: कुछ फ़िरोज़पुर छावनी और कुछ कांगड़ा क्षेत्र का भूंपल गाँव बताते हैं।

यशपाल का निधन कब हुआ और उम्र क्या थी?

यशपाल का निधन 26 दिसंबर 1976 को हुआ। उस समय उनकी उम्र लगभग 73 वर्ष थी।

यशपाल की सबसे प्रसिद्ध रचना कौन-सी है?

‘झूठा सच’ उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना मानी जाती है। यह भारत-विभाजन पर आधारित दो खंडों का उपन्यास है। ‘दिव्या’ भी बहुत चर्चित है।

क्या यशपाल क्रांतिकारी थे?

हाँ, वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के सदस्य थे और भगत सिंह तथा सुखदेव के साथी रहे। आज़ाद के बाद उन्होंने संगठन का नेतृत्व भी किया और जेल गए।

यशपाल का विवाह जेल में क्यों हुआ?

प्रकाशवती कपूर से उनका विवाह 7 अगस्त 1936 को बरेली सेंट्रल जेल में हुआ, जब वे कैद में थे। स्रोतों के अनुसार यह भारत में जेल के अंदर हुआ पहला विवाह था।

यशपाल को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस रचना पर मिला?

उन्हें उपन्यास ‘मेरी तेरी उसकी बात’ के लिए 1976 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

यशपाल की आत्मकथा का नाम क्या है?

उनकी आत्मकथा का नाम ‘सिंहावलोकन’ है, जो तीन खंडों में 1951 से 1955 के बीच प्रकाशित हुई। इसमें क्रांतिकारी आंदोलन का विस्तृत विवरण मिलता है।

यशपाल किस साहित्यिक धारा के लेखक माने जाते हैं?

उन्हें प्रगतिवादी धारा का और प्रेमचंद के बाद के युग का प्रमुख कथाकार माना जाता है। उनके लेखन पर मार्क्सवादी दृष्टि का गहरा प्रभाव है।