तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के सबसे बड़े कवि माने जाते हैं। उनका महाकाव्य रामचरितमानस आज भी करोड़ों घरों में पढ़ा और गाया जाता है, और बोर्ड परीक्षाओं में तुलसीदास का जीवन परिचय लगभग हर साल पूछा जाता है। इस लेख में उनके जीवन, रचनाओं, भाषा-शैली और साहित्यिक विशेषताओं को सरल भाषा में समझाया गया है।
एक बात पहले ही साफ़ कर देनी ज़रूरी है: तुलसीदास के जन्म-वर्ष और जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है। जहाँ मतभेद है, वहाँ इस लेख में उसे साफ़ शब्दों में ‘मान्यता’ या ‘मतभेद’ लिखा गया है, ताकि आप परीक्षा में अपने पाठ्यक्रम के अनुसार सही तथ्य चुन सकें।
तुलसीदास का जीवन परिचय: एक नज़र में
| पूरा नाम | गोस्वामी तुलसीदास (बचपन का नाम मान्यता के अनुसार रामबोला) |
| जन्म | विद्वानों में मतभेद। हिंदी पाठ्यपुस्तकों में प्रचलित मान्यता: संवत् 1589 (लगभग 1532 ई.); कुछ विद्वान संवत् 1568 (1511 ई.) मानते हैं, और कुछ स्रोत इससे अलग वर्ष भी बताते हैं |
| जन्मस्थान | मान्यता है कि राजापुर (चित्रकूट/बाँदा क्षेत्र, उत्तर प्रदेश); कुछ विद्वान सोरों (कासगंज, उत्तर प्रदेश) को जन्मस्थान मानते हैं |
| माता-पिता | हुलसी देवी और आत्माराम दुबे (परंपरा और मान्यता के अनुसार) |
| गुरु | नरहरिदास (परंपरा के अनुसार) |
| पत्नी | रत्नावली (लोकप्रसिद्ध मान्यता) |
| मृत्यु | संवत् 1680 (लगभग 1623 ई.), काशी (वाराणसी), यह तिथि अधिकतर स्रोतों में मिलती है |
| काव्यधारा | भक्तिकाल, रामभक्ति शाखा (सगुण भक्ति) |
| भाषा | अवधी और ब्रज |
| सबसे प्रसिद्ध रचना | रामचरितमानस |
| उपाधियाँ | गोस्वामी, लोकनायक कवि, कई विद्वानों द्वारा ‘हिंदी का वाल्मीकि’ जैसी उपमाएँ |
जन्म और जन्मस्थान: मतभेद क्या है
तुलसीदास ने अपने काव्य में अपने जीवन के बारे में बहुत कम लिखा है। इसी कारण उनके जीवन की ज़्यादातर बातें परंपरा, बाद के जीवनीकारों और भक्तों की कथाओं से आती हैं। यही वजह है कि जन्म-वर्ष को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं।
हिंदी की स्कूली पुस्तकों में सामान्यतः संवत् 1589 यानी लगभग 1532 ई. को उनका जन्म-वर्ष बताया जाता है। दूसरी ओर कई आधुनिक विद्वान और अंग्रेज़ी संदर्भ-ग्रंथ संवत् 1568 यानी 1511 ई. की ओर झुकते हैं। इसलिए परीक्षा में वही वर्ष लिखें जो आपकी पाठ्यपुस्तक में दिया गया हो।
जन्मस्थान के बारे में भी दो प्रमुख मत हैं। एक मत राजापुर (चित्रकूट क्षेत्र) को उनकी जन्मभूमि मानता है, जबकि दूसरा मत सोरों (कासगंज) की बात करता है। दोनों ही स्थानों पर उनसे जुड़ी स्मृतियाँ और स्थानीय परंपराएँ मिलती हैं, और विद्वानों में इस पर सहमति नहीं बन पाई है।
बचपन, शिक्षा और रत्नावली का प्रसंग (परंपरा के अनुसार)
लोक-परंपरा के अनुसार तुलसीदास का बचपन कठिनाइयों में बीता। कहा जाता है कि जन्म के कुछ समय बाद ही वे माता-पिता से बिछड़ गए और उनका पालन-पोषण संतों के सान्निध्य में हुआ। इन कथाओं के ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, इसलिए इन्हें मान्यता के रूप में ही पढ़ना चाहिए।
परंपरा बताती है कि उनके गुरु नरहरिदास थे, जिनसे उन्होंने राम-कथा सुनी और संस्कृत, शास्त्र तथा पुराणों का अध्ययन किया। बाद में काशी में रहकर उन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन किया, ऐसा भी माना जाता है।
उनके विवाह की कथा सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में से एक है। मान्यता है कि पत्नी रत्नावली के प्रति उनका गहरा लगाव था। एक बार रत्नावली के कहे शब्दों ने उनके मन को झकझोर दिया और वे सांसारिक मोह छोड़कर राम-भक्ति के मार्ग पर चल पड़े। यह प्रसंग लोकप्रिय ज़रूर है, पर इसे भी विद्वान पूरी तरह प्रामाणिक इतिहास नहीं मानते।
रामचरितमानस की रचना और काशी का जीवन
माना जाता है कि तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना अयोध्या में रामनवमी के दिन आरंभ की और इसे पूरा करने में लगभग दो वर्ष से अधिक का समय लगा। रचना का आरंभ-काल संवत् 1631 के आसपास बताया जाता है। यह तिथि स्वयं ग्रंथ के भीतर दिए संकेतों पर आधारित मानी जाती है।
रामचरितमानस की सबसे बड़ी बात यह है कि यह संस्कृत के बजाय आम लोगों की भाषा अवधी में लिखी गई। इससे राम-कथा विद्वानों के दायरे से निकलकर गाँव-गाँव तक पहुँची। कहा जाता है कि तुलसीदास ने रामलीला की परंपरा को भी लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
जीवन का बड़ा हिस्सा उन्होंने काशी में बिताया। वाराणसी का तुलसी घाट उनके नाम से जाना जाता है, और संकटमोचन हनुमान मंदिर की स्थापना की परंपरा भी उनसे जोड़ी जाती है। अंतिम समय के बारे में आम मान्यता है कि संवत् 1680 (लगभग 1623 ई.) में काशी में उनका देहांत हुआ।
तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ
तुलसीदास के नाम से बारह के आसपास ग्रंथ गिने जाते हैं, जिनमें से कुछ की प्रामाणिकता पर बहस है। परीक्षा की दृष्टि से नीचे दी गई रचनाएँ सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
| रचना | भाषा और विशेषता |
| रामचरितमानस | अवधी में लिखा सात कांडों वाला प्रबंध-काव्य: बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड। मुख्य छंद दोहा और चौपाई |
| विनयपत्रिका | ब्रजभाषा में गेय पदों का संग्रह, जिसमें कवि ने राम के दरबार में अपनी विनती ‘पत्रिका’ के रूप में रखी है। इसमें भक्ति और दैन्य भाव गहरा है |
| कवितावली | ब्रजभाषा में कवित्त और सवैया छंदों में राम-कथा का वर्णन, जो कांडों के क्रम में चलता है |
| गीतावली | ब्रजभाषा में गेय पदों के रूप में राम के जीवन के प्रसंग, विशेषकर बाल-लीला और करुण प्रसंग |
| दोहावली | दोहों का संग्रह, जिसमें नीति, भक्ति और जीवन-व्यवहार की बातें हैं |
| कृष्ण गीतावली | ब्रजभाषा में कृष्ण की लीलाओं पर आधारित पद, जो दिखाता है कि तुलसीदास की दृष्टि संकीर्ण नहीं थी |
| पार्वती मंगल | अवधी में शिव-पार्वती विवाह का काव्य-वर्णन |
| जानकी मंगल | अवधी में राम-सीता विवाह का वर्णन |
| बरवै रामायण | बरवै छंद में लिखी संक्षिप्त राम-कथा |
| हनुमान बाहुक | हनुमान की स्तुति पर आधारित रचना, जो परंपरा के अनुसार कष्ट के समय रची गई |
हनुमान चालीसा भी परंपरा से तुलसीदास के नाम से जुड़ी है और करोड़ों लोग इसका पाठ करते हैं। आप हमारे ब्लॉग पर हनुमान चालीसा हिंदी में और संकट मोचन हनुमान अष्टक पढ़ सकते हैं। ‘श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन’ स्तुति भी तुलसीदास की रचना के रूप में जानी जाती है, जिसे श्री राम स्तुति पेज पर पढ़ा जा सकता है।
रामचरितमानस का महत्त्व
रामचरितमानस को केवल धार्मिक ग्रंथ कहना उसके साथ अन्याय होगा। यह साहित्य, लोक-जीवन और सामाजिक आदर्शों का संगम है। इसमें राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत किया गया है, और परिवार, मित्रता, राज-धर्म तथा त्याग के आदर्श कथा के माध्यम से सामने आते हैं।
इस ग्रंथ की चौपाइयाँ कहावतों की तरह लोकजीवन में घुल-मिल गई हैं। इसी वजह से उत्तर भारत की रामलीलाओं, कथा-वाचन और भजन परंपरा में इसका स्थान आज भी अटूट है।
तुलसीदास की भाषा-शैली
तुलसीदास की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे दो काव्य-भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। रामचरितमानस, जानकी मंगल और पार्वती मंगल जैसी कृतियाँ अवधी में हैं, जबकि विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली और कृष्ण गीतावली ब्रजभाषा में हैं।
उनकी भाषा में तत्सम शब्दों की गरिमा, तद्भव शब्दों की सहजता और लोक-बोली की मिठास एक साथ दिखती है। इसमें अलंकारों का सहज प्रयोग है, जैसे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अनुप्रास, जो भाव को सजाते हैं, बोझ नहीं बनते।
शैली की दृष्टि से उन्होंने अपने समय की लगभग सभी प्रचलित काव्य-शैलियों का प्रयोग किया: दोहा-चौपाई वाली प्रबंध शैली, कवित्त-सवैया की शैली और पद-शैली (गीति)। इसी कारण उन्हें समन्वय की प्रतिभा वाला कवि कहा जाता है।
तुलसीदास की साहित्यिक विशेषताएँ
- समन्वय की भावना: सगुण और निर्गुण, ज्ञान और भक्ति, शैव और वैष्णव जैसे परस्पर भिन्न मतों के बीच मेल का प्रयास उनके काव्य में दिखता है।
- लोकमंगल की दृष्टि: उनका काव्य व्यक्ति की मुक्ति के साथ समाज के कल्याण की बात भी करता है।
- आदर्श चरित्र-चित्रण: राम, सीता, भरत, लक्ष्मण और हनुमान जैसे पात्र आदर्श के रूप में उभरते हैं।
- भक्ति का दास्य भाव: कवि स्वयं को राम का दास मानता है और विनम्रता उनकी भक्ति की पहचान है।
- रस और छंद की विविधता: शांत, करुण, वीर और श्रृंगार, सभी रस मिलते हैं, और दोहा, चौपाई, सोरठा, हरिगीतिका, कवित्त तथा सवैया जैसे छंद प्रयुक्त हुए हैं।
- सरल और प्रभावशाली अभिव्यक्ति: गहरी बातें भी सहज भाषा में कही गई हैं, इसीलिए वे जन-जन तक पहुँचीं।
परीक्षा के लिए याद रखने योग्य बातें
- तुलसीदास भक्तिकाल की रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं।
- जन्म और जन्मस्थान में मतभेद है: राजापुर और सोरों दोनों का नाम लिया जाता है, पाठ्यक्रम के अनुसार लिखें।
- मृत्यु का वर्ष संवत् 1680 (लगभग 1623 ई.) और स्थान काशी बताया जाता है।
- रामचरितमानस अवधी में और विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली ब्रजभाषा में हैं।
- अन्य महत्त्वपूर्ण कवियों के साथ तुलना के लिए जयशंकर प्रसाद, निराला और सुमित्रानंदन पंत के जीवन परिचय भी पढ़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
तुलसीदास का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
इस पर विद्वानों में मतभेद है। हिंदी पाठ्यपुस्तकों में प्रायः संवत् 1589 (लगभग 1532 ई.) और राजापुर बताया जाता है, जबकि कुछ विद्वान संवत् 1568 (1511 ई.) और सोरों को मानते हैं।
तुलसीदास की सबसे प्रसिद्ध रचना कौन सी है?
रामचरितमानस, जो अवधी भाषा में लिखा गया उनका प्रसिद्ध महाकाव्य है।
तुलसीदास किस काव्यधारा के कवि थे?
वे भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा की रामभक्ति शाखा के कवि थे।
तुलसीदास के गुरु कौन थे?
परंपरा के अनुसार उनके गुरु नरहरिदास थे। इस बारे में भी जीवनीकारों में पूर्ण एकमत नहीं है।
तुलसीदास की भाषा कौन सी थी?
उन्होंने मुख्यतः अवधी और ब्रजभाषा में रचनाएँ कीं। रामचरितमानस अवधी में है, जबकि विनयपत्रिका और कवितावली ब्रजभाषा में हैं।
क्या हनुमान चालीसा तुलसीदास ने लिखी?
परंपरा में हनुमान चालीसा को तुलसीदास की रचना माना जाता है और यही व्यापक मान्यता है, हालाँकि इसके रचना-काल के प्रमाण सीमित हैं।
तुलसीदास की मृत्यु कब हुई?
अधिकांश स्रोतों के अनुसार संवत् 1680 (लगभग 1623 ई.) में काशी में।
स्रोत-नोट: जीवन की अनेक बातें परंपरा और बाद के जीवनीकारों पर आधारित हैं, इसलिए जहाँ प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं वहाँ उन्हें मान्यता के रूप में लिखा गया है।