दुर्गा अष्टमी, जिसे महाअष्टमी भी कहते हैं, नवरात्रि और दुर्गा पूजा का सबसे प्रमुख दिन माना जाता है। इस लेख में आप जानेंगे दुर्गा अष्टमी पूजा विधि, 2026 की तारीख, संधि पूजा का समय, महागौरी की कथा और इस दिन के आसान नियम।
इस साल महाअष्टमी सोमवार 19 अक्टूबर 2026 को है। कोलकाता की गणना के अनुसार अष्टमी तिथि सुबह 10:51 बजे तक है, और संधि पूजा का समय लगभग सुबह 10:27 से 11:15 बजे तक बताया गया है। नोट: तिथियाँ और समय स्थानीय पंचांग से मिलाएँ / verify with a local panchang। यहाँ दिया गया संधि पूजा का समय कोलकाता/पश्चिम बंगाल की गणना के अनुसार है।
दुर्गा अष्टमी 2026: तारीख और समय एक नज़र में
- दिन और तारीख: सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 (महाअष्टमी)
- अष्टमी तिथि समाप्त (कोलकाता गणना): सुबह लगभग 10:51 बजे
- संधि पूजा (कोलकाता): लगभग सुबह 10:27 से 11:15 बजे, यानी करीब 48 मिनट
- अगला दिन: महानवमी, मंगलवार 20 अक्टूबर 2026, और उसी दिन अखिल भारतीय विजयादशमी/दशहरा
- बंगाल में: महा षष्ठी 17 अक्टूबर, महा सप्तमी 18 अक्टूबर, बिजया दशमी 21 अक्टूबर
अलग-अलग शहरों में सूर्योदय के अनुसार तिथि का समय बदलता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग अवश्य देख लें।
महाअष्टमी का महत्व
मान्यता है कि अष्टमी के दिन माँ दुर्गा ने अपने उग्र रूप में असुरों का संहार किया था, इसलिए इसे शक्ति की उपासना का सबसे बड़ा दिन माना जाता है। इसी दिन के अंत और नवमी के आरंभ के संधि-काल में संधि पूजा होती है, जिसके बारे में हम आगे विस्तार से बता रहे हैं।
उत्तर भारत में अष्टमी के दिन अक्सर कन्या पूजन किया जाता है, जबकि बंगाल में पंडालों में अंजलि, भोग और आरती की भीड़ रहती है। अगर आप दुर्गा पूजा की पूरी पृष्ठभूमि समझना चाहते हैं, तो दुर्गा पूजा क्या है वाला लेख पढ़ें।
महागौरी: नवरात्रि का आठवाँ रूप
नवदुर्गा में आठवाँ स्वरूप माँ महागौरी का माना जाता है। मान्यता है कि कठोर तपस्या के बाद उनका वर्ण अत्यंत गौर, यानी श्वेत हो गया, इसलिए उन्हें महागौरी कहा गया। उन्हें अक्सर श्वेत वस्त्र पहने और वृषभ (बैल) पर सवार दिखाया जाता है। उनके हाथ में त्रिशूल और डमरू का वर्णन मिलता है।
कथाओं के अनुसार देवी पार्वती ने शिवजी को पति रूप में पाने के लिए लंबी तपस्या की थी। इसी कथा से महागौरी को धैर्य, पवित्रता और शांति का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन सफ़ेद फूल, नारियल और सफ़ेद मिठाई जैसे खीर या नारियल की बर्फी अर्पित करते हैं। ये बातें लोक-मान्यता और पुराण-कथाओं पर आधारित हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़ी भिन्न मिल सकती हैं।
घर पर दुर्गा अष्टमी पूजा विधि
नीचे की विधि सरल घरेलू पूजा के लिए है। परिवार का कोई विशेष नियम हो तो उसे ही प्राथमिकता दें।
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ़ वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को साफ़ कर लें।
- चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र रखें। यदि कलश स्थापित है, तो उसे प्रणाम करें।
- दीपक और धूप जलाएँ। माँ को रोली, अक्षत, लाल फूल (विशेषकर गुड़हल) और चुनरी अर्पित करें।
- महागौरी का ध्यान करते हुए नारियल, फल और मिठाई का भोग लगाएँ।
- दुर्गा चालीसा, अष्टकम या सप्तशती के श्लोकों का पाठ करें। इसके लिए दुर्गा चालीसा, दुर्गा अष्टकम और दुर्गा सप्तशती मंत्र के लेख उपयोगी हैं।
- अंत में माँ दुर्गा की आरती करें और परिवार के साथ प्रसाद बाँटें।
- यदि घर में हवन की परंपरा है, तो अष्टमी या नवमी पर छोटा हवन किया जाता है। हवन के नियम स्थानीय पंडित से पूछ लें।
संधि पूजा: अष्टमी और नवमी का मिलन
संधि का अर्थ है मिलन-बिंदु। मान्यता है कि अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के पहले 24 मिनट, यानी कुल लगभग 48 मिनट का समय संधि पूजा का होता है। इसी क्षण को देवी के चामुंडा रूप से जोड़ा जाता है, जिन्होंने चंड और मुंड नामक असुरों का वध किया था।
बंगाल की परंपरा में इस समय 108 दीपक जलाए जाते हैं और 108 कमल के फूल चढ़ाने की प्रथा है। कोलकाता के बड़े पंडालों में इस पूजा के समय घंटे, शंख और ढाक की ध्वनि गूँजती है। 2026 में कोलकाता की गणना के अनुसार यह समय लगभग सुबह 10:27 से 11:15 बजे तक है। अंग्रेज़ी में विस्तृत जानकारी के लिए हमारा Sandhi Puja Explained लेख देखें।
कन्या पूजन और भोग
अष्टमी के दिन कई परिवारों में कन्या पूजन किया जाता है। चरण-दर-चरण विधि, भोग की सूची, उम्र की मान्यता और उपहारों के विचार हमने अलग लेख कन्या पूजन विधि में विस्तार से दिए हैं, ताकि यहाँ बात दोहराई न जाए। संक्षेप में, हलवा-पूरी-चना का भोग लगाया जाता है और कन्याओं को सम्मान के साथ उपहार दिया जाता है।
व्रत और खान-पान
जो लोग नवरात्रि में पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, वे अष्टमी पर भी सात्विक भोजन लेते हैं। इस दिन कुछ लोग निराहार या फलाहार रहते हैं और कन्या पूजन के बाद व्रत खोलते हैं। व्रत में क्या खाएँ और क्या नहीं, यह जानने के लिए नवरात्रि व्रत के नियम और भोजन सूची पढ़ें। स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या हो तो डॉक्टर की सलाह से ही उपवास रखें।
क्या करें और क्या न करें
- करें: पूजा से पहले स्नान और सफ़ाई का ध्यान रखें, और मन शांत रखकर पूजा करें।
- करें: स्थानीय पंचांग से अष्टमी और नवमी की सही तिथि व समय का मिलान कर लें।
- करें: घर के बड़ों और बच्चों को पूजा में शामिल करें, ताकि परंपरा आगे बढ़े।
- न करें: पूजा के दिन झगड़ने, क्रोध करने या किसी का अपमान करने से बचें।
- न करें: सोशल मीडिया की अधूरी जानकारी पर भरोसा करके समय न बदलें। जब संदेह हो, पंडित या पंचांग से पूछें।
- न करें: दिखावे के लिए ज़्यादा खर्च न करें। श्रद्धा और सादगी ही मूल है।
आगे क्या: नवमी और दशहरा
अष्टमी के अगले दिन महानवमी, मंगलवार 20 अक्टूबर 2026, को हवन और पूर्णाहुति की परंपरा है, और उसी दिन अखिल भारतीय दशहरा/विजयादशमी मनाया जा रहा है। बंगाल में बिजया दशमी 21 अक्टूबर को है, जब शाम को सिंदूर खेला होता है और फिर विसर्जन। दशहरा की जानकारी के लिए दशहरा क्या है पढ़ें। ध्यान रहे, पूजा के फल मान्यता के रूप में बताए गए हैं, किसी परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दुर्गा अष्टमी 2026 कब है?
महाअष्टमी सोमवार 19 अक्टूबर 2026 को है। कोलकाता की गणना के अनुसार अष्टमी तिथि सुबह लगभग 10:51 बजे तक है। अपने शहर के लिए स्थानीय पंचांग देखें।
संधि पूजा का समय क्या है?
कोलकाता की गणना के अनुसार संधि पूजा लगभग सुबह 10:27 से 11:15 बजे तक है, यानी लगभग 48 मिनट।
महागौरी कौन हैं?
महागौरी नवदुर्गा का आठवाँ रूप मानी जाती हैं। मान्यता है कि तपस्या के बाद उनका रंग गौर हो गया। उनकी पूजा अष्टमी पर की जाती है।
अष्टमी पर कन्या पूजन कैसे करें?
कन्याओं को आमंत्रित करें, पैर धोएँ, तिलक लगाएँ, भोग खिलाएँ और उपहार दें। पूरी विधि हमारे कन्या पूजन विधि वाले लेख में दी गई है।
अष्टमी पर कौन-सा भोग लगाएँ?
नारियल, खीर, हलवा-पूरी और चने का भोग प्रचलित है। महागौरी को नारियल या सफ़ेद मिठाई का भोग लगाने की मान्यता है।
क्या अष्टमी का व्रत ज़रूरी है?
व्रत व्यक्तिगत श्रद्धा और स्वास्थ्य पर निर्भर है। जो व्रत नहीं रख सकते, वे सात्विक भोजन और पूजा-पाठ से भी देवी का स्मरण कर सकते हैं।