सकट चौथ व्रत कथा (Sakat Chauth Sahukar Sahukarni Katha) में एक साहूकार और साहूकारनी का प्रसंग सुना जाता है, जो परंपरा में सकट चौथ के व्रत में कही जाती है। इस पेज पर कथा, व्रत की सामान्य विधि और अक्सर पूछे जाने वाले सवाल दिए गए हैं।
सकट चौथ व्रत कथा – एक साहूकार और साहूकारनी एक नज़र में
- व्रत / कथा: सकट चौथ व्रत कथा – एक साहूकार और साहूकारनी
- देवता: भगवान गणेश (सकट माता)
- कब: माघ कृष्ण चतुर्थी को, हर साल
सकट चौथ व्रत कथा – एक साहूकार और साहूकारनी (पूरी कथा)
एक साहूकार और एक साहूकारनी थे। वह धर्म पुण्य को नहीं मानते थे। इसके कारण उनके कोई बच्चा नहीं था। एक दिन साहूकारनी पडोसी के घर गयी। उस दिन सकट चौथ था, वहाँ पड़ोसन सकट चौथ की पूजा करके कहानी सुना रही थी।
साहूकारनी ने पड़ोसन से पूछा: तुम क्या कर रही हो?
तब पड़ोसन बोली कि आज चौथ का व्रत है, इसलिए कहानी सुना रही हूँ।
तब साहूकारनी बोली: चौथ के व्रत करने से क्या होता है?
तब पड़ोसन बोली: इसे करने से अन्न, धन, सुहाग, पुत्र सब मिलता है।
तब साहूकारनी ने कहा: यदि मेरा गर्भ रह जाये तो में सवा सेर तिलकुट करुँगी और चौथ का व्रत करुँगी।
श्री गणेश भगवान की कृपया से साहूकारनी के गर्भ रह गया। तो वह बोली कि मेरे लड़का हो जाये, तो में ढाई सेर तिलकुट करुँगी। कुछ दिन बाद उसके लड़का हो गया, तो वह बोली कि हे चौथ भगवान! मेरे बेटे का विवाह हो जायेगा, तो सवा पांच सेर का तिलकुट करुँगी।
कुछ वर्षो बाद उसके बेटे का विवाह तय हो गया और उसका बेटा विवाह करने चला गया। लेकिन उस साहूकारनी ने तिलकुट नहीं किया। इस कारण से चौथ देव क्रोधित हो गये और उन्होंने फेरो से उसके बेटे को उठाकर पीपल के पेड़ पर बिठा दिया। सभी वर को खोजने लगे पर वो नहीं मिला, हतास होकर सारे लोग अपने-अपने घर को लौट गए। इधर जिस लड़की से साहूकारनी के लड़के का विवाह होने वाला था, वह अपनी सहेलियों के साथ गणगौर पूजने के लिए जंगल में दूब लेने गयी।
तभी रास्ते में पीपल के पेड़ से आवाज आई: ओ मेरी अर्धब्यहि!
यह बात सुनकर जब लड़की घर आयी, उसके बाद वह धीरे-धीरे सूख कर काँटा होने लगी।
एक दिन लड़की की माँ ने कहा: मैं तुम्हें अच्छा खिलाती हूँ, अच्छा पहनाती हूँ, फिर भी तू सूखती जा रही है? ऐसा क्यों?
तब लड़की अपनी माँ से बोली कि वह जब भी दूब लेने जंगल जाती है, तो पीपल के पेड़ से एक आदमी बोलता है कि ओ मेरी अर्धब्यहि।
उसने मेहँदी लगा राखी है और सेहरा भी बांध रखा है। तब उसकी माँ ने पीपल के पेड़ के पास जा कर देखा, यह तो उसका जमाई ही है।
तब उसकी माँ ने जमाई से कहा: यहाँ क्यों बैठे हैं? मेरी बेटी तो अर्धब्यहि कर दी और अब क्या लोगे?
साहूकारनी का बेटा बोला: मेरी माँ ने चौथ का तिलकुट बोला था लेकिन नहीं किया, इस लिए चौथ माता ने नाराज हो कर यहाँ बैठा दिया।
यह सुनकर उस लड़की की माँ साहूकारनी के घर गई और उससे पूछा कि तुमने सकट चौथ का कुछ बोला है क्या?
तब साहूकारनी बोली: तिलकुट बोला था। उसके बाद साहूकारनी बोली मेरा बेटा घर आजाये, तो ढाई मन का तिलकुट करुँगी।
इससे श्री गणेश भगवन प्रसंन हो गए और उसके बेटे को फेरों में लाकर बैठा दिया। बेटे का विवाह धूम-धाम से हो गया। जब साहूकारनी के बेटा एवं बहू घर आगए तब साहूकारनी ने ढाई मन तिलकुट किया और बोली हे चौथ देव! आप के आशीर्वाद से मेरे बेटा-बहू घर आये हैं, जिससे में हमेसा तिलकुट करके व्रत करुँगी। इसके बाद सारे नगर वासियों ने तिलकुट के साथ सकट व्रत करना प्रारम्भ कर दिया।
हे सकट चौथ! जिस तरह साहूकारनी को बेटे-बहू से मिलवाया, वैसे ही हम सब को मिलवाना। इस कथा को कहने सुनने वालों का भला करना।
बोलो सकट चौथ की जय। श्री गणेश देव की जय।
व्रत और पूजा की सामान्य विधि
परंपरा में सकट चौथ माघ कृष्ण चतुर्थी को रखा जाता है। दिन भर व्रत रखकर शाम को भगवान गणेश की पूजा की जाती है, कथा सुनी जाती है और चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। तिथि और नियम अपनी पारिवारिक परंपरा और पंचांग के अनुसार अपनाएँ।
व्रत का महत्व (मान्यता के अनुसार)
मान्यता है कि श्रद्धा से सकट चौथ का व्रत रखने और कथा सुनने पर भगवान गणेश की कृपा और संतान की कुशलता की कामना पूरी होती है। यह आस्था पर आधारित है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सकट चौथ कब मनाई जाती है?
परंपरा में यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है। सही तिथि हर साल पंचांग के अनुसार बदलती है।
सकट चौथ में किसकी पूजा होती है?
मुख्य रूप से भगवान गणेश की पूजा की जाती है और चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
यह कथा किस बारे में है?
इसमें एक साहूकार-साहूकारनी के सकट चौथ का व्रत करने का प्रसंग आता है।
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नोट: यहाँ बताए गए लाभ और नियम धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।



