तुलसी माता की आरती क्या है
हिंदू घरों के आँगन में तुलसी का चौरा सिर्फ़ एक पौधे की जगह नहीं होता, वह घर की आस्था का केंद्र माना जाता है। सुबह जल चढ़ाना और शाम को दीपक जलाना, यह क्रम पीढ़ियों से चला आ रहा है। इसी भाव को शब्द देने वाली रचना है “जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता” आरती। इसमें तुलसी को केवल पौधा नहीं, बल्कि माता के रूप में पुकारा गया है, जो सबको सुख देने वाली और वर देने वाली हैं।
यह आरती छोटी है और इसकी भाषा सरल है, इसलिए बच्चे भी इसे जल्दी सीख लेते हैं। कार्तिक मास, देव उठनी एकादशी, तुलसी विवाह और रोज़ की संध्या पूजा, हर मौके पर इसे गाने की परंपरा है। इस पेज पर आपको आरती के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ, गाने का तरीका और कुछ ज़रूरी सवालों के जवाब मिलेंगे। अगर आप तुलसी माता की चालीसा भी पढ़ना चाहते हैं तो हमारी श्री तुलसी चालीसा वाली पोस्ट देख सकते हैं।
जय जय तुलसी माता: आरती के पूरे बोल
नीचे आरती उसी क्रम में दी गई है जिसमें इसे आमतौर पर गाया जाता है। हर पद के बाद “जय तुलसी माता” की टेक दोहराई जाती है।
जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता।
सब जग की सुखदाता, सबकी वर माता॥
॥ जय तुलसी माता ॥
सब योगों से ऊपर, सब रोगों से ऊपर।
रुज से रक्षा करके, सबकी भव त्राता॥
॥ जय तुलसी माता ॥
बटु पुत्री है श्यामा, सुरबल्ली है ग्राम्या।
विष्णुप्रिया जो नर तुमको सेवे, सो नर तर जाता॥
॥ जय तुलसी माता ॥
हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वंदित।
पतित जनों की तारिणी, तुम हो विख्याता॥
॥ जय तुलसी माता ॥
लेकर जन्म विजन में, आई दिव्य भवन में।
मानव लोक तुम्हीं से, सुख-संपति पाता॥
॥ जय तुलसी माता ॥
हरि को तुम अति प्यारी, श्याम वर्ण सुकुमारी।
प्रेम अजब है उनका, तुमसे कैसा नाता॥
॥ जय तुलसी माता ॥
जय जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता।
सब जग की सुखदाता, सबकी वर माता॥
नोट: अलग-अलग छपी पुस्तिकाओं और वेबसाइटों में कुछ शब्दों में थोड़ा अंतर मिलता है। जैसे दूसरे पद में कहीं “रज से रक्षा” और कहीं “रुज से रक्षा” छपा है (रुज यानी रोग), तीसरे पद में “बटु पुत्री” की जगह “बहु पुत्री” और “सुरबल्ली” की जगह “सूर वल्ली” भी मिलता है, और कुछ पाठों में अंतिम पद की दूसरी पंक्ति थोड़ी अलग है। यहाँ वही पाठ रखा गया है जो ज़्यादातर भक्ति साइटों पर मिलता है। आप अपने घर की परंपरा वाला पाठ गा सकते हैं।
आरती का सरल अर्थ
पहला पद: भक्त तुलसी माता की जय बोलता है और कहता है कि वे सारे संसार को सुख देने वाली हैं और सबको वरदान देने वाली माता हैं। यहाँ “सब जग” कहकर यह भाव जताया गया है कि माता की कृपा किसी एक के लिए नहीं, सबके लिए है।
दूसरा पद: इसमें कहा गया है कि तुलसी सब योगों और सब रोगों से ऊपर हैं और रोग-कष्ट से रक्षा करके संसार-सागर से पार लगाने वाली हैं। यह पंक्ति मान्यता का भाव है, इसे इलाज का दावा न समझें। आयुर्वेद में तुलसी की चर्चा औषधीय पौधे के रूप में ज़रूर होती है, पर बीमारी में डॉक्टर की सलाह ही आधार रहनी चाहिए।
तीसरा पद: यहाँ तुलसी के अलग-अलग नाम और रूप गिनाए गए हैं, जैसे श्यामा (श्याम रंग वाली), सुरबल्ली (देवताओं की प्रिय लता) और ग्राम्या (गाँव-घर में सहज उगने वाली)। “बटु पुत्री” पद का अर्थ अलग-अलग व्याख्याओं में अलग बताया जाता है, इसलिए इसे लेकर उलझने की ज़रूरत नहीं। आगे कहा गया है कि जो भक्त विष्णुप्रिया तुलसी की सेवा करता है, वह भवसागर तर जाता है।
चौथा पद: मान्यता है कि भगवान विष्णु को तुलसी दल अत्यंत प्रिय है, इसलिए कहा गया कि तुलसी हरि के शीश पर विराजती हैं। तीनों लोकों में वंदना पाने वाली और पतित जनों को तारने वाली माता के रूप में उनकी ख्याति बताई गई है।
पाँचवाँ पद: तुलसी ने वन में जन्म लिया पर आज वे हर घर के दिव्य आँगन में स्थापित हैं। भाव यह है कि साधारण जगह से आई तुलसी ने मानव लोक को सुख और संपत्ति का आशीर्वाद दिया।
छठा पद: श्याम वर्ण की सुकुमारी तुलसी श्रीहरि को अत्यंत प्रिय हैं। भक्त कहता है कि इस प्रेम का नाता कितना अनोखा है, और माता से प्रार्थना करता है कि हमारी विपत्तियाँ दूर करें।
तुलसी माता से जुड़ी कथा और भाव
पुराणों की कथाओं में तुलसी का संबंध वृंदा से जोड़ा जाता है। लोक मान्यता के अनुसार वृंदा असुर राजा जालंधर की पतिव्रता पत्नी थीं और भगवान विष्णु की परम भक्त भी। कथा आगे बढ़ती है तो भगवान विष्णु शालिग्राम रूप में तुलसी के साथ पूजित होते हैं। इसी कारण कार्तिक शुक्ल पक्ष में तुलसी और शालिग्राम के विवाह की परंपरा चली आ रही है, जिसे तुलसी विवाह कहा जाता है। कथा के अलग-अलग रूप अलग क्षेत्रों में सुनाए जाते हैं, इसलिए ब्योरे में फ़र्क़ मिलना स्वाभाविक है।
कथा का सार एक ही है: भक्ति, पवित्रता और निष्ठा का फल मिलता है, और जो भक्त सच्चे मन से सेवा करता है उसे ईश्वर अपने समीप स्थान देते हैं। शायद इसी कारण भगवान की पूजा में तुलसी दल के बिना भोग अधूरा समझा जाता है। घरों में तुलसी रोपना केवल धार्मिक आदत नहीं, हरियाली और स्वच्छ आँगन से जुड़ी एक सुंदर परंपरा भी है। यदि आप सत्यनारायण पूजन करते हैं तो श्री सत्यनारायण जी की आरती भी इसी भाव से जुड़ी है।
तुलसी माता की आरती कब और कैसे करें
आमतौर पर तुलसी माता की आरती सुबह स्नान के बाद जल चढ़ाते समय या शाम को दीपक जलाते समय की जाती है। कार्तिक मास में रोज़ शाम को तुलसी के पास घी या तिल के तेल का दीया जलाने की परंपरा है। देव उठनी एकादशी और तुलसी विवाह के दिन आरती का विशेष महत्व माना जाता है।
सरल विधि इस प्रकार है:
- सबसे पहले हाथ-पैर धोकर साफ़ वस्त्र पहनें और तुलसी के चौरे के आसपास सफ़ाई कर लें।
- तुलसी को जल अर्पित करें। रोली, अक्षत और पुष्प चढ़ाएँ।
- घी का दीपक जलाएँ। कई परिवार चौरे के पास रंगोली भी बनाते हैं।
- दीप की थाली लेकर तुलसी माता की ओर घड़ी की दिशा में आरती घुमाते हुए ऊपर लिखे बोल गाएँ।
- आरती के बाद हाथ जोड़कर अपने परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें और प्रसाद बाँटें।
परंपरा में रविवार और एकादशी के दिन तुलसी को जल न चढ़ाने और पत्ते न तोड़ने की बात कही जाती है, इसलिए ऐसे दिनों में बहुत से लोग केवल दीपक जलाकर आरती करते हैं। यह घर-घर की परंपरा पर निर्भर है, इसलिए अपने परिवार के बड़ों से पूछ लेना ठीक रहता है।
आरती पाठ के लाभ (मान्यता)
- मान्यता है कि तुलसी की आरती करने से घर में सकारात्मक वातावरण बनता है।
- कहा जाता है कि श्रद्धा से आरती करने वाले परिवार पर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहती है।
- रोज़ दीपक जलाने और आरती गाने से मन शांत होता है और दिन की शुरुआत या अंत एक नियम के साथ होता है।
- बच्चों में पूजा-पाठ और प्रकृति के प्रति सम्मान का संस्कार भी इसी बहाने आता है।
ये सब आस्था से जुड़ी बातें हैं। किसी भी पाठ या पूजा को चिकित्सा, परीक्षा या कानूनी मामले का विकल्प न समझें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
तुलसी माता की आरती कितनी देर की होती है?
पूरी आरती गाने में लगभग दो से तीन मिनट लगते हैं। सामूहिक पूजा में घंटी और शंख के साथ थोड़ा ज़्यादा समय लग सकता है।
क्या रोज़ तुलसी की आरती करना ज़रूरी है?
ज़रूरी नहीं, पर कई परिवार रोज़ शाम को करते हैं। कार्तिक मास, एकादशी और तुलसी विवाह पर इसे विशेष रूप से किया जाता है।
तुलसी विवाह कब मनाया जाता है?
यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष में, देव उठनी एकादशी के आसपास मनाया जाता है। सही तारीख हर साल पंचांग के अनुसार बदलती है, इसलिए स्थानीय पंचांग देख लें।
क्या तुलसी माता की आरती में कोई मंत्र भी बोलना चाहिए?
आरती से पहले या बाद में “ॐ तुलस्यै नमः” जैसा सरल नमन-मंत्र बोलने की परंपरा है। यह वैकल्पिक है, भाव सबसे महत्वपूर्ण है।
अगर घर में तुलसी सूख जाए तो क्या करें?
लोक परंपरा में सूखी तुलसी को सम्मान के साथ बहते जल में प्रवाहित करने या साफ़ मिट्टी में रखने की बात कही जाती है, और फिर नया पौधा लगाया जाता है। इसे अशुभ मानकर चिंता करने की ज़रूरत नहीं।
आरती के बाद आप हमारी माँ दुर्गा आरती भी पढ़ सकते हैं।