शनि देव की आरती का परिचय
"जय जय श्री शनिदेव, भक्तन हितकारी" शनि देव की प्रचलित आरतियों में से एक है। इसमें उन्हें सूर्य देव का पुत्र और छाया का पुत्र कहा गया है, गज पर सवार, नीले वस्त्र धारण करने वाला और चार भुजाओं वाला बताया गया है। आरती में यह भी याद किया गया है कि तेल, तिल और उड़द जैसी वस्तुएँ उन्हें प्रिय मानी जाती हैं।
लोक मान्यता है कि शनि देव न्याय के देवता हैं और कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसी भाव से भक्त शनिवार की शाम उनका स्मरण करते हैं और आरती गाते हैं। यह परंपरा आस्था पर टिकी है, इसलिए इसे अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार निभाना सबसे अच्छा रहता है।
शनि देव की आरती: पूरे बोल
नीचे आरती के बोल क्रम से दिए गए हैं। पेज को प्रिंट करके आप इन्हें पूजा-पुस्तिका की तरह भी रख सकते हैं। अलग-अलग स्रोतों में कुछ शब्दों की वर्तनी थोड़ी भिन्न मिलती है, यहाँ प्रचलित रूप दिया गया है।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी ।
सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव.. ॥
श्याम अंग वक्र दृष्टि चतुर्भुजा धारी ।
नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव.. ॥
क्रीट मुकुट शीश रजित दिपत है लिलारी ।
मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव.. ॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी ।
लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव.. ॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी ।
विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥
॥ जय जय श्री शनिदेव.. ॥
आरती करने की विधि
- शनिवार को शाम के समय स्नान करके स्वच्छ, सादे वस्त्र पहनें।
- शनि देव की प्रतिमा या चित्र के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
- काले तिल, उड़द और नीले या गहरे रंग के फूल अर्पित करें।
- धीमे और शांत स्वर में ऊपर लिखी आरती गाएँ।
- आरती के बाद प्रणाम करें और ज़रूरतमंद को भोजन या सहायता देने का संकल्प लें।
मान्यताएँ और ध्यान रखने की बातें
श्रद्धालु मानते हैं कि शनिवार को संयम, सादगी और सेवा का भाव रखने से शनि देव प्रसन्न होते हैं। कई लोग इस दिन गरीबों को भोजन देते हैं या श्रमिकों की सहायता करते हैं। ये सब आस्था से जुड़ी बातें हैं और किसी निश्चित परिणाम का दावा नहीं हैं। पूजा करते समय मन शांत और व्यवहार विनम्र रखना सबसे ज़रूरी माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शनि देव की आरती कब करनी चाहिए?
परंपरा में शनिवार की शाम, खासकर सूर्यास्त के आसपास, शनि देव की पूजा और आरती का समय माना जाता है। शनि जयंती और शनि अमावस्या पर भी भक्त इसे श्रद्धा से करते हैं।
शनि देव को क्या अर्पित किया जाता है?
मान्यता है कि सरसों का तेल, काले तिल, उड़द और नीले फूल अर्पित किए जाते हैं। आरती में भी इन वस्तुओं का उल्लेख मिलता है। अपनी क्षमता और सुविधा के अनुसार जो संभव हो, वही चढ़ाएँ।
क्या शनि की साढ़ेसाती में यह आरती पढ़ी जा सकती है?
कई लोग ऐसे समय में मन की शांति के लिए पाठ और आरती करते हैं। यह आस्था की बात है। ज्योतिष संबंधी निर्णय के लिए किसी विश्वसनीय जानकार से परामर्श लेना ठीक रहता है।
क्या आरती याद करना ज़रूरी है?
नहीं। देखकर गाना भी उतना ही मान्य है। इस पेज के बोल सामने रखकर आराम से गाया जा सकता है।
अंतिम जाँच: 16 अक्टूबर 2026