मधुराष्टकम् (Madhurashtakam), जिसकी शुरुआत “अधरं मधुरं वदनं मधुरं” से होती है, भगवान श्रीकृष्ण की मधुरता का वर्णन करने वाला संस्कृत स्तोत्र है। परंपरा में इसे श्री वल्लभाचार्य की रचना माना जाता है। इस पेज पर पूरा पाठ, पाठ की विधि और FAQ दिए गए हैं।
मधुराष्टकम् (अधरं मधुरं वदनं मधुरं) एक नज़र में
- पाठ: मधुराष्टकम् (अधरं मधुरं वदनं मधुरं)
- देवता: भगवान श्रीकृष्ण
- कब पढ़ें: सुबह की पूजा में, जन्माष्टमी पर विशेष रूप से
मधुराष्टकम् (अधरं मधुरं वदनं मधुरं) का पाठ (Madhurashtakam Lyrics)
मधुराष्टकं में श्रीकृष्ण के बालरूप को मधुरता से माधुरतम रूप का वर्णन किया गया है। श्रीकृष्ण के प्रत्येक अंग, गतिविधि एवं क्रिया-कलाप मधुर है, और उनके संयोग से अन्य सजीव और निर्जीव वस्तुएं भी मधुरता को प्राप्त कर लेती हैं। प्रभु के परमप्रिय भक्त महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य जी को मधुराष्टकं रचना के लिए शत -शत कोटि नमन!
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरं ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥१॥
वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरं ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥२॥
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥३॥
गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरं ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥४॥
करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरं ।
वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥५॥
गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥६॥
गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरं।
दृष्टं मधुरं सृष्टं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥७॥
गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा ।
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपते रखिलं मधुरं ॥८॥
पाठ कैसे करें
सुबह स्नान के बाद साफ़ स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ। फिर श्रद्धा और शांत मन से पाठ करें। नियम और संख्या अपनी परिवार परंपरा या किसी जानकार की सलाह से तय करें।
पाठ के लाभ (मान्यता के अनुसार)
मान्यता है कि श्रद्धा से मधुराष्टकम् का पाठ करने पर भगवान श्रीकृष्ण की कृपा मिलती है और मन में मधुरता तथा शांति आती है। ये लाभ आस्था पर आधारित हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
मधुराष्टकम् (अधरं मधुरं वदनं मधुरं) क्या है?
यह भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की मधुरता का वर्णन करने वाला आठ श्लोकों का स्तोत्र है।
मधुराष्टकम् (अधरं मधुरं वदनं मधुरं) का पाठ कब करें?
आमतौर पर सुबह की पूजा में और जन्माष्टमी पर। कोई एक निश्चित समय अनिवार्य नहीं माना जाता।
क्या इसे रोज़ पढ़ सकते हैं?
हाँ, श्रद्धालु इसे रोज़ की पूजा में भी पढ़ते हैं। इसके लिए कोई कठोर नियम नहीं माना जाता।
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नोट: यहाँ बताए गए लाभ और नियम धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।