कुंजबिहारी आरती क्या है
“आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की” भगवान श्रीकृष्ण की सबसे प्रसिद्ध आरती है। जन्माष्टमी की रात हो, किसी मंदिर की सांध्य-आरती हो या घर की रोज़ की पूजा, यह आरती लगभग हर जगह गूँजती है। इसमें कान्हा के रूप का चित्र खींचा गया है: गले में बैजंती माला, हाथ में मुरली, कानों में कुंडल और माथे पर कस्तूरी का तिलक।
गिरिधर का अर्थ है गोवर्धन पर्वत उठाने वाले और मुरारी का अर्थ है मुर नामक दैत्य का अंत करने वाले। यह आरती भक्त को कृष्ण के उसी रूप में ले जाती है जहाँ वृंदावन की रेत है, बंसी की धुन है और गोप-गोपियाँ आनंद में झूम रहे हैं। इस पेज पर पूरी आरती, उसका सरल अर्थ, गाने की विधि और आम सवाल एक साथ दिए गए हैं। कृष्ण की स्तुति के लिए आप हमारी कृष्ण चालीसा भी पढ़ सकते हैं।
आरती कुंजबिहारी की: पूरे बोल
आरती के चार पद हैं और हर पद के अंत में “श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की” की टेक आती है। गाते समय पहली दो पंक्तियाँ हर पद के बाद दोहराई जाती हैं।
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
गले में बैजंती माला,
बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली,
राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली,
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की…॥
कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै।
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग, अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की…॥
जहां ते प्रकट भई गंगा,
सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा,
बसी शिव सीस, जटा के बीच,
हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की…॥
चमकती उज्ज्वल तट रेनू,
बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू,
हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद,
कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की…॥
नोट: कुछ पुस्तिकाओं और गायकों के यहाँ एकाध शब्द अलग मिलता है। भाव एक ही रहता है।
हर पद का सरल अर्थ
पहला पद: कृष्ण के श्रृंगार का वर्णन है। गले में वैजयंती की माला है, मधुर बाँसुरी बज रही है, कानों में कुंडल झिलमिला रहे हैं। उनका श्याम वर्ण आकाश जैसा गहरा है और पास में राधा जी की आभा चमक रही है। माथे पर कस्तूरी का तिलक और चंद्रमा जैसी झलक उन्हें और मनोहर बनाती है।
दूसरा पद: सोने का मोर-मुकुट पहने कान्हा के दर्शन के लिए देवता भी तरसते हैं। आकाश से फूलों की वर्षा होती है, मृदंग और मुरचंग बजते हैं और ग्वालिनों के साथ गोप-कुमारियों का निर्मल प्रेम दिखता है।
तीसरा पद: इस पद में कहा गया है कि जिन चरणों से गंगा प्रकट हुईं, जिनके स्मरण से मोह का बंधन टूटता है, उन्हीं चरणों की छवि पापों की कीचड़ धो देती है। परंपरा में गंगा को विष्णु के चरणों से निकली माना गया है, इसलिए यह संकेत यहाँ आता है।
चौथा पद: यमुना किनारे की चमकती रेत, वृंदावन की वंशी, चारों ओर गोप-गोपियाँ और गायें। भक्त प्रार्थना करता है कि जो दीन-दुखियों की पुकार सुनते हैं, वे हमारी भी सुन लें और संसार के फंदे काट दें।
कृष्ण आरती कब और कैसे करें
जन्माष्टमी पर इसका विशेष महत्व है, पर श्रद्धालु इसे रोज़ शाम की पूजा में, गुरुवार को या एकादशी पर भी गाते हैं। मंदिरों में सुबह की मंगला आरती और शाम की संध्या आरती में इसका गायन आम है।
- लड्डू गोपाल या कृष्ण जी की मूर्ति को साफ़ जल से स्नान कराएँ और स्वच्छ वस्त्र पहनाएँ।
- माखन-मिश्री या तुलसी-दल का भोग लगाएँ। परंपरा में कृष्ण को तुलसी प्रिय मानी जाती है।
- घी का दीपक जलाएँ और धूप दिखाएँ।
- शंख, घंटी और ताल के साथ आरती गाएँ और थाली को भगवान के सामने गोल घुमाएँ।
- आरती के बाद सबको प्रसाद बाँटें और हाथ जोड़कर प्रणाम करें।
आरती गाने के लाभ (मान्यता)
मान्यता है कि कृष्ण की आरती भक्ति और प्रेम का भाव जगाती है। कई लोग मानते हैं कि इसे श्रद्धा से गाने पर मन की उलझनें हल्की होती हैं, परिवार में आपसी स्नेह बढ़ता है और जीवन के कठिन समय में धैर्य मिलता है। ये लाभ आस्था से जुड़े हैं। इतना अनुभव सबका है कि समूह में ताल के साथ आरती गाने से घर का माहौल उत्सव जैसा हो जाता है, और बच्चे भी परंपरा से जुड़ते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
“कुंजबिहारी” का क्या मतलब है?
कुंज यानी लताओं से घिरा वन-स्थल और बिहारी यानी विहार करने वाला। कुंजबिहारी का अर्थ है वृंदावन के कुंजों में विहार करने वाले श्रीकृष्ण।
गिरिधर और मुरारी कृष्ण को क्यों कहा जाता है?
इंद्र के कोप से ब्रजवासियों को बचाने के लिए कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया, इसलिए वे गिरिधर कहलाए। मुर दैत्य का वध करने के कारण उन्हें मुरारी भी कहा जाता है।
क्या यह आरती सिर्फ़ जन्माष्टमी पर गाई जाती है?
नहीं, इसे रोज़ की पूजा में भी गाया जा सकता है। जन्माष्टमी पर बस इसका उत्साह कुछ अधिक रहता है।
आरती के समय क्या भोग लगाना चाहिए?
माखन-मिश्री, पंजीरी, फल या तुलसी-दल, जो भी आप श्रद्धा से बना सकें। भोग की मात्रा से ज़्यादा भाव महत्वपूर्ण माना जाता है।
बच्चों को यह आरती कैसे सिखाएँ?
पहले दो पंक्तियाँ बार-बार गवाएँ, फिर हर पद का सरल अर्थ कहानी की तरह सुनाएँ। जल्दी याद हो जाती है।
अन्य आरतियाँ पढ़ें: माँ दुर्गा की आरती और श्री राम चालीसा।