जितिया व्रत (Jitiya Vrat Katha)

Jitiya Vrat Katha in Hindi | जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत कथा (पूरी कथा)

जितिया व्रत कथा (Jitiya Vrat Katha), जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत कथा भी कहा जाता है, माताओं द्वारा संतान की लंबी उम्र और कुशलता के लिए रखे जाने वाले व्रत में सुनी जाती है। इस पेज पर कथा, व्रत की सामान्य विधि और अक्सर पूछे जाने वाले सवाल दिए गए हैं।

जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत कथा एक नज़र में

  • व्रत / कथा: जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत कथा
  • देवता: जीमूतवाहन
  • कब: आश्विन कृष्ण अष्टमी को, हर साल

जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत कथा (पूरी कथा)

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक गरुड़ और एक मादा लोमड़ी नर्मदा नदी के पास एक हिमालय के जंगल में रहते थे। दोनों ने कुछ महिलाओं को पूजा करते और उपवास करते देखा और खुद भी इसे देखने की कामना की। उनके उपवास के दौरान, लोमड़ी भूख के कारण बेहोश हो गई और चुपके से भोजन कर लिया। दूसरी ओर, चील ने पूरे समर्पण के साथ व्रत का पालन किया और उसे पूरा किया। परिणामस्वरूप लोमड़ी से पैदा हुए सभी बच्चे जन्म के कुछ दिन बाद ही खत्म हो गए और चील की संतान लंबी आयु के लिए धन्य हो गई।

इस कथा के अनुसार जीमूतवाहन गंधर्व के बुद्धिमान और राजा थे। जीमूतवाहन शासक बनने से संतुष्ट नहीं थे और परिणामस्वरूप उन्होंने अपने भाइयों को अपने राज्य की सभी जिम्मेदारियां दीं और अपने पिता की सेवा के लिए जंगल में चले गए। एक दिन जंगल में भटकते हुए उन्‍हें एक बुढ़िया विलाप करती हुई मिलती है। उन्‍होंने बुढ़िया से रोने का कारण पूछा। इसपर उसने उसे बताया कि वह सांप (नागवंशी) के परिवार से है और उसका एक ही बेटा है। एक शपथ के रूप में हर दिन एक सांप पक्षीराज गरुड़ को चढ़ाया जाता है और उस दिन उसके बेटे का नंबर था।

उसकी समस्या सुनने के बाद ज‍िमूतवाहन ने उन्‍हें आश्‍वासन द‍िया क‍ि वह उनके बेटे को जीव‍ित वापस लेकर आएंगे। तब वह खुद गरुड़ का चारा बनने का व‍िचार कर चट्टान पर लेट जाते हैं। तब गरुड़ आता है और अपनी अंगुलियों से लाल कपड़े से ढंके हुए जिमूतवाहन को पकड़कर चट्टान पर चढ़ जाता है। उसे हैरानी होती है क‍ि ज‍िसे उसने पकड़ा है वह कोई प्रति‍क्रिया क्‍यों नहीं दे रहा है। तब वह ज‍िमूतवाहन से उनके बारे में पूछता है। तब गरुड़ ज‍िमूतवाहन की वीरता और परोपकार से प्रसन्न होकर सांपों से कोई और बलिदान नहीं लेने का वादा करता है। मान्‍यता है क‍ि तभी से ही संतान की लंबी उम्र और कल्‍याण के ल‍िए ज‍ित‍िया व्रत मनाया जाता है।

व्रत और पूजा की सामान्य विधि

परंपरा में यह व्रत आश्विन कृष्ण अष्टमी के आसपास रखा जाता है। माताएँ स्नान के बाद संकल्प लेकर जीमूतवाहन की पूजा करती हैं और कथा सुनती हैं। कई क्षेत्रों में यह निर्जला व्रत होता है। व्रत की तिथि और नियम अपनी स्थानीय परंपरा के अनुसार तय करें, और स्वास्थ्य संबंधी स्थिति में डॉक्टर की सलाह लें।

व्रत का महत्व (मान्यता के अनुसार)

मान्यता है कि श्रद्धा से जितिया व्रत रखने और कथा सुनने पर संतान की कुशलता और दीर्घायु की कामना पूरी होती है। यह आस्था पर आधारित है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

जितिया व्रत कब रखा जाता है?

परंपरा में यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के आसपास रखा जाता है। सही तिथि हर साल पंचांग के अनुसार बदलती है।

जितिया व्रत कौन रखता है?

यह व्रत मुख्य रूप से माताएँ अपनी संतान की कुशलता के लिए रखती हैं।

क्या यह व्रत निर्जला होता है?

कई क्षेत्रों की परंपरा में यह निर्जला रखा जाता है, पर नियम परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकते हैं। स्वास्थ्य की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लें।

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नोट: यहाँ बताए गए लाभ और नियम धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं।