शिव आरती क्या है
“ॐ जय शिव ओंकारा” भगवान शिव की सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली आरती है। सोमवार की पूजा हो, महाशिवरात्रि की रात हो या श्रावण में किसी शिवालय की सांध्य-आरती, यह आरती हर जगह एक ही लय में गाई जाती है। इसकी खूबी यह है कि इसमें शिव के रूप का वर्णन भी है और ब्रह्मा, विष्णु और महेश के एक ही परम तत्व के तीन रूप होने का दार्शनिक संकेत भी।
आठ छोटे पदों वाली इस आरती के अंत में रचयिता का नाम “शिवानंद स्वामी” आता है, जैसा कि कई आरतियों में परंपरा है। इस पेज पर आपको पूरी आरती, हर पद का सरल अर्थ, पूजा की विधि, मान्यताएँ और सवालों के जवाब मिलेंगे। शिव की स्तुति के और पाठ के लिए शिव चालीसा भी देख सकते हैं।
ॐ जय शिव ओंकारा: आरती के पूरे बोल
नीचे आरती का प्रचलित पाठ दिया गया है। हर पद के बाद “ॐ जय शिव ओंकारा” की टेक दोहराई जाती है।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकर्ता दुखहर्ता जगपालनकर्ता॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवान्छित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
नोट: अलग-अलग पुस्तिकाओं में कुछ शब्द भिन्न मिलते हैं, जैसे चौथे पद की दूसरी पंक्ति “सोहे त्रिपुरारी” और अंतिम पंक्ति में “सुख संपति पावे”। कुछ संस्करणों में लक्ष्मी, सावित्री, पार्वती और काशी के विश्वनाथ वाले अतिरिक्त पद भी जुड़े मिलते हैं। परिवार में जो पाठ चला आ रहा हो, उसी का पालन करें।
आरती का सरल अर्थ
पहला पद: ओंकार स्वरूप शिव की जय हो। वे ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव के रूप में प्रकट होते हैं और अर्धांगिनी पार्वती उनके साथ विराजती हैं।
दूसरा और तीसरा पद: शिव के कई रूपों का वर्णन है। कहीं एक मुख, कहीं चार, कहीं पाँच मुख वाले रूप में वे सुशोभित हैं। उनके वाहन हंस, गरुड़ और बैल बताए गए हैं, यानी ब्रह्मा, विष्णु और शिव की सवारियाँ। दो, चार और दस भुजाओं वाला त्रिगुण रूप देखकर तीनों लोकों के लोग मोहित हो जाते हैं।
चौथा और पाँचवाँ पद: रुद्राक्ष की माला, वनमाला और मुंडमाला पहने शिव के माथे पर चंदन और कस्तूरी का लेप है और मस्तक पर चंद्रमा। वे सफ़ेद, पीले और बाघ-छाल के वस्त्रों में हैं और सनकादि ऋषि, ब्रह्मा आदि और भूत-गण उनके संग रहते हैं।
छठा पद: हाथों के बीच कमंडल, चक्र और त्रिशूल धारण करने वाले शिव सुख देने वाले, दुख हरने वाले और संसार का पालन करने वाले कहे गए हैं।
सातवाँ पद: जो लोग ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव को अलग-अलग मान लेते हैं, यह पद उन्हें बताता है कि प्रणव यानी ॐ के भीतर ये तीनों एक ही हैं।
आठवाँ पद: फलश्रुति है। जो भी इस आरती को गाता है, उसे मनचाहा फल मिलता है, ऐसी मान्यता है।
शिव आरती कब और कैसे करें
सोमवार का दिन शिव पूजा के लिए विशेष माना जाता है। इसके अलावा प्रदोष व्रत, श्रावण मास के सोमवार और महाशिवरात्रि पर इसका गायन सबसे अधिक होता है। मंदिरों में संध्या के समय की आरती प्रचलित है।
- शिवलिंग या शिव-चित्र के सामने साफ़ आसन पर बैठें।
- जल या कच्चे दूध से अभिषेक करें और बेलपत्र, धतूरा या सफ़ेद फूल अर्पित करें। परंपरा में बेलपत्र शिव को प्रिय माना जाता है।
- घी या तेल का दीपक और धूप जलाएँ।
- घंटी या डमरू की ताल पर आरती गाएँ और थाली घुमाएँ।
- अंत में “ॐ नमः शिवाय” का कुछ बार जप करें और प्रसाद बाँटें।
शिव आरती के लाभ (मान्यता)
मान्यता है कि श्रद्धा से शिव आरती गाने पर मन में शांति और साहस आता है और जीवन की बाधाएँ कम महसूस होती हैं। भक्त इसे मनोकामना-पूर्ति, परिवार की सुख-शांति और आत्मबल से जोड़कर देखते हैं। ये बातें आस्था पर टिकी हैं। व्यावहारिक रूप से भी रोज़ कुछ मिनट शांत बैठकर लयबद्ध पाठ करने से मन स्थिर होता है, यह कई लोगों का अनुभव है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
“ओंकारा” का क्या अर्थ है?
ओंकार यानी ॐ, वह आदि ध्वनि जिसे सृष्टि का मूल माना गया है। शिव को ओंकार स्वरूप कहने का भाव है कि वे उसी परम तत्व के प्रतीक हैं।
इस आरती के रचयिता कौन हैं?
आरती की अंतिम पंक्ति में “शिवानंद स्वामी” का नाम आता है। इसी से उन्हें रचयिता माना जाता है, पर उनके जीवन के बारे में पक्के ऐतिहासिक विवरण हमें नहीं मिलते।
क्या यह आरती केवल सोमवार को गाई जाती है?
नहीं, इसे रोज़ भी गाया जा सकता है। सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि पर बस विशेष रूप से गाने की परंपरा है।
आरती में तीनों देवताओं का ज़िक्र क्यों है?
आरती यह भाव रखती है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश अलग दिखते हुए भी प्रणव (ॐ) में एक हैं। इसी कारण शिव को यहाँ त्रिगुण-स्वामी कहा गया है।
अगर आरती के शब्द याद न हों तो क्या करें?
इस पेज को सामने रखकर पढ़ते हुए गाएँ। कुछ दिनों के अभ्यास में पूरी आरती याद हो जाती है।
और पढ़ें: हनुमान चालीसा और माँ दुर्गा की आरती।