फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (जन्म: 4 मार्च 1921, औराही हिंगना गाँव, तत्कालीन पूर्णिया ज़िला, बिहार; निधन: 11 अप्रैल 1977) हिंदी में आंचलिक कथा-साहित्य के सबसे प्रभावशाली लेखक माने जाते हैं। उनका उपन्यास ‘मैला आँचल’ (1954) किसी एक नायक की नहीं, पूरे अंचल की कहानी कहता है। इसी कारण उन्हें ‘आज़ादी के बाद का प्रेमचंद’ कहा जाता है। ‘तीसरी कसम’ फ़िल्म की मूल कहानी भी उन्हीं की है। परीक्षा की दृष्टि से रेणु, आंचलिकता और ‘मैला आँचल’ हिंदी साहित्य के प्रश्नों का स्थायी हिस्सा हैं। यहाँ उनका जीवन और कृतित्व क्रमवार समझाया गया है।
एक नज़र में
| पूरा नाम | फणीश्वरनाथ रेणु |
| जन्म | 4 मार्च 1921 |
| जन्मस्थान | औराही हिंगना, तत्कालीन पूर्णिया (अब अररिया) ज़िला, बिहार |
| निधन | 11 अप्रैल 1977 |
| विधा | उपन्यास, कहानी, रिपोर्ताज, संस्मरण |
| पहचान | आंचलिक उपन्यास के प्रवर्तक |
| प्रसिद्ध कृति | मैला आँचल (1954) |
| सम्मान | पद्मश्री (1970) |
जीवन परिचय
रेणु का बचपन बिहार के पूर्णिया अंचल में बीता, जहाँ की बोली, लोकगीत, मेले और खेती-किसानी का जीवन आगे चलकर उनकी रचनाओं की जान बना। प्रारंभिक पढ़ाई अररिया और फारबिसगंज में हुई। कुछ स्रोतों के अनुसार उन्होंने मैट्रिक की पढ़ाई नेपाल में की, जहाँ वे कोइराला परिवार के संपर्क में आए। बाद में उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट किया।
रेणु केवल लेखक नहीं, सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे। विद्यार्थी जीवन में ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए, समाजवादी विचारधारा के निकट आए और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेकर जेल गए। 1950 में नेपाल की राणाशाही विरोधी क्रांति में भी उन्होंने भूमिका निभाई, जिसका अनुभव ‘नेपाली क्रांति कथा’ में मिलता है। कुछ स्रोतों के अनुसार वे बाद में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव में उतरे और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से भी जुड़े। सन 1952-53 के आसपास लंबी बीमारी के दौरान उन्होंने लेखन को गंभीरता से अपनाया और 1954 में ‘मैला आँचल’ प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें रातोंरात चर्चित कर दिया। 11 अप्रैल 1977 को उनका निधन हो गया।
प्रमुख रचनाएँ
- उपन्यास: मैला आँचल (1954), परती परिकथा (1957), जुलूस, दीर्घतपा, कितने चौराहे (1966), पलटू बाबू रोड
- कहानी-संग्रह: ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, अच्छे आदमी
- प्रसिद्ध कहानियाँ: मारे गए गुलफ़ाम (जिस पर ‘तीसरी कसम’ बनी), पंचलाइट, ठेस, संवदिया
- संस्मरण/रिपोर्ताज: ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गंध, श्रुत अश्रुत पूर्वे, समय की शिला पर, नेपाली क्रांति कथा
‘मैला आँचल’ में बिहार के एक पिछड़े गाँव की कथा है, जहाँ अंधविश्वास, गरीबी, जातिगत भेद और स्वतंत्रता के बाद उभरती राजनीति एक साथ दिखाई देती है। ‘परती परिकथा’ में भी ज़मीन और मनुष्य का रिश्ता केंद्र में है।
रेणु की कहानियों में भी वही लोक-संवेदना मिलती है। ‘पंचलाइट’ में गाँव की एक पेट्रोमैक्स बत्ती के बहाने पूरे टोले की आपसी खींचतान और हास्य उभरता है, जबकि ‘मारे गए गुलफ़ाम’ में गाड़ीवान हीरामन का सरल, निश्छल मन सामने आता है। इन रचनाओं की ताकत किसी बड़े विचार के उपदेश में नहीं, छोटे-छोटे मानवीय क्षणों में है। यही कारण है कि उनकी कथाएँ पढ़ने के बाद पाठक के मन में पात्रों से अधिक पूरा परिवेश रह जाता है। विद्यार्थियों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि रेणु की आंचलिकता केवल बोली का प्रयोग नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि है।
भाषा-शैली और साहित्यिक विशेषताएँ
- रेणु ने आंचलिकता को नया रूप दिया; उनके यहाँ अंचल स्वयं एक पात्र की तरह उपस्थित है।
- भाषा में लोक-बोली, लोकगीतों की पंक्तियाँ और ग्रामीण मुहावरे सहज रूप से घुले हैं।
- ध्वनियों, गंधों और दृश्यों का ऐसा चित्रण करते हैं कि पाठक को गाँव का वातावरण महसूस होने लगता है।
- कथा किसी एक नायक के सहारे नहीं, कई पात्रों के सामूहिक जीवन से आगे बढ़ती है।
- शैली में व्यंग्य, करुणा और लोक-रस का मेल है।
- प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी परंपरा को उन्होंने स्वतंत्र भारत के गाँवों तक पहुँचाया।
पुरस्कार और सम्मान
- पद्मश्री (1970): साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए।
- उन्होंने यह सम्मान आपातकाल के विरोध में लौटा दिया था। लौटाने के वर्ष को लेकर स्रोतों में भिन्नता है, इसलिए यहाँ वर्ष नहीं दिया जा रहा।
परीक्षा के लिए जरूरी तथ्य
- रेणु आंचलिक उपन्यास के प्रवर्तक माने जाते हैं।
- ‘मैला आँचल’ 1954 में प्रकाशित हुआ; इसे प्रेमचंद के ‘गोदान’ के बाद हिंदी का अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपन्यास कहा जाता है।
- ‘परती परिकथा’ का प्रकाशन वर्ष 1957 है।
- कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर 1966 में फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ बनी, जिसके निर्देशक बासु भट्टाचार्य थे।
- उन्हें 1970 में पद्मश्री मिली और आपातकाल के विरोध में उन्होंने इसे लौटा दिया।
- जन्म: 4 मार्च 1921; निधन: 11 अप्रैल 1977।
- ‘ऋणजल धनजल’ और ‘वन तुलसी की गंध’ उनकी संस्मरणात्मक कृतियाँ हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
फणीश्वरनाथ रेणु किस विधा के लिए प्रसिद्ध हैं?
वे आंचलिक उपन्यास और कहानी के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हें हिंदी में आंचलिक कथा-धारा का प्रवर्तक माना जाता है।
‘मैला आँचल’ कब प्रकाशित हुआ?
‘मैला आँचल’ 1954 में प्रकाशित हुआ। यह रेणु का पहला उपन्यास था, जिसने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई।
‘तीसरी कसम’ फ़िल्म किस कहानी पर आधारित है?
यह फ़िल्म रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर आधारित है। फ़िल्म 1966 में आई और बासु भट्टाचार्य ने इसका निर्देशन किया।
रेणु ने पद्मश्री क्यों लौटाई?
स्रोतों के अनुसार उन्होंने आपातकाल के विरोध में पद्मश्री का सम्मान लौटा दिया था।
स्रोत
अंतिम जाँच: 16 अक्टूबर 2026