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अन्नपूर्णा माता की आरती | बारम्बार प्रणाम Lyrics, अर्थ और विधि

अन्नपूर्णा माता की आरती क्या है

हमारे यहाँ अन्न को देवता माना गया है और जिनके हाथ में अन्न का भंडार है, उन्हें कहते हैं माँ अन्नपूर्णा। परंपरा में वे पार्वती जी का ही एक रूप हैं और काशी, यानी वाराणसी, में उनका प्रसिद्ध मंदिर है। रसोई में पहला कौर निकालते समय, या भोजन से पहले हाथ जोड़ते समय लोग इन्हीं माता को याद करते हैं। उनकी स्तुति में गाई जाने वाली लोकप्रिय आरती है “बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम”।

इस आरती की टेक बहुत सीधी है: माँ, हम आपको बार-बार प्रणाम करते हैं। पूरी रचना में अनुप्रास की मिठास है, जैसे “चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारु चक्रधर श्याम” में च अक्षर की झंकार। नीचे आरती के बोल, उसका सरल अर्थ, पूजन की विधि और जरूरी सवालों के जवाब दिए गए हैं। लक्ष्मी रूप की स्तुति भी पढ़नी हो तो लक्ष्मी जी की आरती देखें।

बारम्बार प्रणाम: आरती के पूरे बोल

आरती नीचे उसी क्रम में दी गई है जिसमें इसे गाया जाता है। हर पद के बाद टेक दोहराई जाती है।

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम।
जो नहीं ध्यावे तुम्हें अम्बिके, कहाँ उसे विश्राम।
अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो, लेत होत सब काम॥

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम॥

प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर, कालान्तर तक नाम।
सुर सुरों की रचना करती, कहाँ कृष्ण कहाँ राम॥

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम॥

चूमहि चरण चतुर चतुरानन, चारु चक्रधर श्याम।
चंद्रचूड़ चन्द्रानन चाकर, शोभा लखहि ललाम॥

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम॥

देवि देव! दयनीय दशा में, दया-दया तब नाम।
त्राहि-त्राहि शरणागत वत्सल, शरण रूप तब धाम॥

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम॥

श्रीं, ह्रीं श्रद्धा श्री ऐ विद्या, श्री क्लीं कमला काम।
कांति, भ्रांतिमयी, कांति शांतिमयी, वर दे तू निष्काम॥

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम॥

नोट: इस आरती के पाठ में अलग-अलग जगहों पर काफ़ी अंतर मिलता है। जिन दो साइटों से मिलान किया गया, उनमें पाँच पदों वाला ऊपर का पाठ एक जैसा था। लेकिन कुछ दूसरी साइटों पर “काशी पुर की स्वामिनी” जैसे अलग शब्दों वाले पद भी छपे हैं, जो इस पाठ से मेल नहीं खाते। यहाँ वही पाठ रखा गया है जो ज़्यादा जगह मिलता है। आप अपने घर या मंदिर में गाया जाने वाला पाठ ही अपनाएँ।

आरती का सरल अर्थ

पहला पद: भक्त कहता है कि हे अम्बिके, जो आपका ध्यान नहीं करता उसे कहीं चैन नहीं मिलता। अन्नपूर्णा नाम का स्मरण करने भर से सारे काम सधने लगते हैं, ऐसी श्रद्धा इस पंक्ति में झलकती है।

दूसरा पद: इसमें कहा गया है कि प्रलय हो, युग बदलें या जन्म बदलें, माता का नाम हर काल में बना रहता है। देवताओं की रचना और पालन में भी उन्हीं की शक्ति मानी गई है, इसलिए भक्त पूछता है कि कृष्ण और राम भी उनसे अलग कहाँ हैं। भाव यह है कि सब रूप एक ही शक्ति से जुड़े हैं।

तीसरा पद: ब्रह्मा, विष्णु (चक्रधारी श्याम) और शिव (चंद्रमा को सिर पर धारण करने वाले चंद्रचूड़) सब माता के चरणों में सेवक की तरह उपस्थित हैं। यह पद माता की महिमा का वर्णन है।

चौथा पद: भक्त अपनी दीन दशा पुकारता है, “त्राहि-त्राहि” कहकर शरण माँगता है और माता को शरणागत पर स्नेह रखने वाली, यानी वत्सला कहता है। माता का नाम और धाम ही उसकी शरण है।

पाँचवाँ पद: श्रीं, ह्रीं और क्लीं जैसे बीज अक्षरों के साथ माता को श्री, श्रद्धा, विद्या और कमला जैसे रूपों में पुकारा गया है। अंत में प्रार्थना है कि हे माँ, हमें ऐसा वर दें जिससे हम बिना किसी स्वार्थ के, यानी निष्काम भाव से रह सकें।

माँ अन्नपूर्णा से जुड़ी कथा

लोक कथा के अनुसार एक बार संसार में अन्न का महत्व समझाने के लिए माता पार्वती ने अन्नपूर्णा रूप धारण किया। कथा में बताया जाता है कि भगवान शिव ने काशी में स्वयं भिक्षा के लिए माँ अन्नपूर्णा के सामने पात्र फैलाया और माता ने उन्हें भोजन दिया। इस कथा का संदेश है कि भूखे को भोजन देना सबसे बड़े पुण्य कामों में गिना गया है। अलग-अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में कथा के ब्योरे थोड़े अलग मिलते हैं।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा को अन्नपूर्णा जयंती मनाने की परंपरा है, ऐसा बहुत जगह माना जाता है, और कई जगह इस दिन रसोई की विशेष पूजा होती है। दीपावली के बाद कुछ क्षेत्रों में अन्नकूट का आयोजन भी होता है, जिसमें अन्न के विविध व्यंजन प्रभु को अर्पित किए जाते हैं। इन सबके पीछे एक ही बात है: अन्न का सम्मान करो, उसे बर्बाद मत करो और ज़रूरतमंद के साथ बाँटो।

अन्नपूर्णा माता की आरती कब और कैसे करें

रसोई घर या पूजा-स्थान में सुबह का समय अच्छा माना जाता है। शुक्रवार, पूर्णिमा, अन्नपूर्णा जयंती और नवरात्रि में विशेष रूप से माता की आरती की जाती है। कई परिवार नए अनाज के घर आने पर या भंडार भरते समय भी पहले माता को याद करते हैं।

  • रसोई साफ़ करके स्नान के बाद पूजा का स्थान तैयार करें।
  • माता के चित्र के सामने घी का दीपक जलाएँ और चावल, गुड़ या खीर का भोग रखें।
  • जल, फूल और अक्षत अर्पित करके ऊपर लिखी आरती गाएँ।
  • आरती के बाद भोग में से थोड़ा हिस्सा गाय, पक्षी या ज़रूरतमंद के लिए अलग निकालने की परंपरा है।
  • अंत में परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें।

पूजा चाहे छोटी हो या बड़ी, माता का सच्चा भाव यही माना जाता है कि घर में कोई भूखा न रहे। इसलिए दीपक के साथ-साथ किसी को भोजन कराना भी आरती जितना ही अर्थ रखता है। देवी उपासना के और रूप के लिए माँ दुर्गा की आरती भी देखें।

आरती पाठ के लाभ (मान्यता)

  • मान्यता है कि माँ अन्नपूर्णा की आराधना से घर में अन्न और धन की कमी नहीं रहती।
  • कहा जाता है कि श्रद्धा से आरती करने वाले घर में रसोई की बरकत और संतोष बना रहता है।
  • भोजन से पहले आभार का भाव आता है, जिससे अन्न की बर्बादी कम होती है।
  • दान और सेवा की भावना भी इसी बहाने मन में जागती है।

ये सब आस्था पर टिकी बातें हैं। आरती किसी रोज़गार या आर्थिक मेहनत का विकल्प नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

अन्नपूर्णा माता की आरती कितनी देर की होती है?

पाँच पदों की यह आरती गाने में लगभग दो से तीन मिनट लेती है।

अन्नपूर्णा माता कौन हैं?

परंपरा में माँ पार्वती का वह रूप जो अन्न और पोषण की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। काशी का अन्नपूर्णा मंदिर उनके प्रमुख धामों में गिना जाता है।

अन्नपूर्णा जयंती कब आती है?

आम तौर पर मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को मानी जाती है। सही तारीख पंचांग से देखें।

क्या रसोई में आरती कर सकते हैं?

जी हाँ, रसोई की स्वच्छता रखकर वहाँ दीपक जलाकर आरती करना सामान्य परंपरा है। गैस और ज्वलनशील चीज़ों से दूरी रखें।

क्या आरती के साथ कोई मंत्र भी बोलना चाहिए?

कई लोग भोजन से पहले “अन्नपूर्णे सदापूर्णे” वाला प्रसिद्ध श्लोक पढ़ते हैं। यह वैकल्पिक है।