शीतला माता की आरती क्या है
शीतला माता उत्तर भारत की उन लोकदेवियों में हैं जिन्हें हर गाँव और मोहल्ले में पूजा जाता है। नाम से ही भाव झलकता है: शीतलता देने वाली माता। परंपरा में उन्हें गर्मी, ताप और चेचक-खसरा जैसे रोगों के शमन से जोड़ा जाता है। इसी श्रद्धा से गाई जाने वाली आरती है “जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता”।
यह आरती चैत्र कृष्ण पक्ष की शीतला सप्तमी-अष्टमी (जिसे बसौड़ा भी कहा जाता है) पर विशेष रूप से गाई जाती है, पर बहुत से घरों में माता का स्मरण साल भर होता है। इस पेज पर आरती के बोल, हर पद का सरल अर्थ, पूजन की सामान्य विधि और ज़रूरी सवालों के जवाब दिए गए हैं। माता की चालीसा के लिए हमारी श्री शीतला चालीसा पोस्ट भी देख सकते हैं।
जय शीतला माता: आरती के पूरे बोल
आरती का क्रम नीचे दिया गया है। हर पद के बाद टेक “ॐ जय शीतला माता” दोहराई जाती है।
जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता।
आदि ज्योति महारानी, सब फल की दाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भाता।
ऋद्धि-सिद्धि चँवर ढुलावें, जगमग छवि छाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता।
वेद पुराण वरणत, पार नहीं पाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
इन्द्र मृदङ्ग बजावत, चन्द्र वीणा हाथा।
सूरज ताल बजावै, नारद मुनि गाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
घण्टा शङ्ख शहनाई, बाजै मन भाता।
करै भक्तजन आरती, लखि लखि हर्षाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
ब्रह्म रूप वरदानी, तुही तीन काल ज्ञाता।
भक्तन को सुख देती, मातु पिता भ्राता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
जो जन ध्यान लगावे, प्रेम शक्ति पाता।
सकल मनोरथ पावे, भवनिधि तर जाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
रोगों से जो पीड़ित कोई, शरण तेरी आता।
कोढ़ी पावे निर्मल काया, अन्ध नेत्र पाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
बांझ पुत्र को पावे, दारिद्र कट जाता।
ताको भजै जो नाहीं, सिर धुनि पछताता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
शीतल करती जननी, तू ही है जग त्राता।
उत्पत्ति व्याधि बिनाशन, तू सब की घाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
दास विचित्र कर जोड़े, सुन मेरी माता।
भक्ति आपनी दीजै, और न कुछ भाता॥
॥ ॐ जय शीतला माता ॥
नोट: अलग-अलग स्रोतों में आरती के कुछ शब्द और अंतिम पद अलग मिलते हैं। एक पाठ में रचयिता के रूप में “दास विचित्र” आता है, तो दूसरे में “दास नारायण”। इसी तरह कहीं “चँवर ढुलावें” और कहीं “चँवर डोलावें”, और दसवें पद में कहीं “शीतल करती जन की” तो कहीं “जननी” छपा है। यहाँ एक प्रचलित पाठ दिया गया है, आप अपने घर की परंपरा का पाठ गा सकते हैं।
आरती का सरल अर्थ
पहला पद: भक्त माता को आदि ज्योति और महारानी कहकर पुकारता है और मानता है कि वे हर शुभ फल देने वाली हैं।
दूसरा पद: रत्नों के सिंहासन पर श्वेत छत्र के नीचे विराजमान माता की शोभा का वर्णन है। ऋद्धि और सिद्धि उन पर चँवर डुला रही हैं।
तीसरा पद: भगवान विष्णु और शिव भी माता की सेवा में खड़े हैं और वेद-पुराण भी उनकी महिमा का पूरा पार नहीं पा सके। भाव यह है कि माता की महिमा शब्दों से परे है।
चौथा और पाँचवाँ पद: यहाँ दृश्य एक दिव्य सभा जैसा है, जहाँ इंद्र मृदंग बजाते हैं, चंद्रमा वीणा, सूर्य ताल देते हैं और नारद मुनि गाते हैं। इसके साथ घंटा, शंख और शहनाई के बीच भक्तजन आनंद से आरती करते हैं।
छठा और सातवाँ पद: माता को वरदान देने वाली और तीनों कालों की ज्ञाता कहा गया है। जो ध्यान लगाता है, उसकी मनोकामना पूरी होने और भवसागर पार करने की मान्यता व्यक्त की गई है।
आठवाँ और नौवाँ पद: इन पदों में रोगी, निर्धन और संतान की इच्छा रखने वाले अपनी पुकार रखते हैं। ये आस्था की बातें हैं। किसी भी रोग या संतान की समस्या में डॉक्टर से इलाज कराना सबसे पहला क़दम होना चाहिए, और आरती को उसका विकल्प न समझें।
दसवाँ और ग्यारहवाँ पद: माता को जग की त्राता कहा गया है जो शीतलता देकर रोग-कष्ट का नाश करती हैं। अंतिम पद में भक्त हाथ जोड़कर सिर्फ़ यही माँगता है कि माता अपनी भक्ति दे दें, उसके अलावा कुछ और नहीं चाहिए।
माँ शीतला की कथा और स्वरूप
लोक परंपरा और पुराणों के वर्णन में शीतला माता का रूप कुछ अलग है। उन्हें प्रायः गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू, कलश, सूप और नीम के पत्तों के साथ दिखाया जाता है। प्रतीक का भाव यह समझाया जाता है कि झाड़ू स्वच्छता का, कलश शीतल जल का और नीम रोगों से बचाव की परंपरा का चिह्न है। इन प्रतीकों में हमारे पूर्वजों की साफ़-सफ़ाई और मौसम बदलने के समय सावधानी की सीख भी देखी जाती है।
शीतला अष्टमी के दिन बसौड़ा की परंपरा है, यानी एक दिन पहले पका हुआ भोजन अगले दिन ठंडा ही माता को अर्पित करना और ख़ुद ग्रहण करना। मान्यता है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। यह परंपरा क्षेत्र के अनुसार बदलती है, इसलिए अपने परिवार के नियम का पालन करें। गर्मी में बासी भोजन से पेट की समस्या हो सकती है, इसलिए खान-पान में सावधानी रखें और बच्चों व बुज़ुर्गों का ध्यान रखें।
शीतला माता की आरती कब और कैसे करें
शीतला सप्तमी या अष्टमी, यानी होली के लगभग एक सप्ताह बाद चैत्र कृष्ण पक्ष में, आरती का मुख्य दिन माना जाता है। कुछ जगहों पर वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ के कृष्ण पक्ष में भी पूजा की जाती है। सोमवार और गुरुवार को भी पूजन की परंपरा बताई जाती है।
- सुबह स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और घर में माता का चित्र या शीतला स्थान सजाएँ।
- माता को जल, रोली, हल्दी, अक्षत, फूल और बसौड़ा का ठंडा भोग अर्पित करें।
- घी का दीपक जलाकर ऊपर लिखी आरती गाते हुए थाली घुमाएँ।
- आरती के बाद माता के ठंडे जल का छींटा परिवार पर और घर के द्वार पर देने की परंपरा है।
- अंत में प्रसाद बाँटें और बच्चों को माता का आशीर्वाद दिलाएँ।
जिन्हें मंदिर जाना हो, वे आरती में शामिल होकर भी माता का पूजन कर सकते हैं। यदि आप शक्ति की उपासना के और रूप जानना चाहते हैं, तो माँ दुर्गा की आरती भी पढ़ें।
आरती पाठ के लाभ (मान्यता)
- मान्यता है कि शीतला माता की आरती से घर में शीतलता और शांति बनी रहती है।
- कहा जाता है कि बच्चों के स्वास्थ्य की कामना से माँ का पूजन करने पर उनकी कृपा रहती है।
- इस बहाने मौसम बदलने के समय घर की सफ़ाई, स्वच्छ भोजन और संयम की आदत बनी रहती है।
- परिवार साथ बैठकर पूजा करे तो परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुँचती है।
यह सब श्रद्धा की बातें हैं। चेचक, खसरा या तेज़ बुखार जैसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और बच्चों का टीकाकरण समय पर कराएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
शीतला माता की आरती कितनी देर की होती है?
पूरी आरती गाने में लगभग तीन से चार मिनट लगते हैं।
शीतला अष्टमी कब आती है?
यह चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी को होली के बाद आती है। सही तारीख हर साल पंचांग के अनुसार बदलती है।
बसौड़ा क्या होता है?
बसौड़ा का अर्थ है बासी भोजन। शीतला अष्टमी पर पहले दिन बना ठंडा भोजन माता को अर्पित करने और खाने की परंपरा है।
क्या शीतला माता की आरती घर पर कर सकते हैं?
जी हाँ। घर में माता का चित्र रखकर दीपक जलाएँ और भाव से आरती करें, मंदिर जाना अनिवार्य नहीं माना जाता।
क्या आरती से चेचक या बीमारी ठीक हो जाती है?
आरती आस्था और मन की शांति के लिए है। किसी भी बीमारी का इलाज डॉक्टर से कराएँ।