EVM फुल फॉर्म Electronic Voting Machine का ग्राफ़िक

EVM फुल फॉर्म: Electronic Voting Machine क्या है, कैसे काम करती है और इतिहास

हर चुनाव के समय टीवी, अख़बार और सोशल मीडिया पर एक शब्द बार-बार सुनाई देता है, EVM। EVM का फुल फॉर्म है Electronic Voting Machine, यानी हिंदी में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन। भारत में आज लोकसभा से लेकर विधानसभा तक के चुनाव इसी मशीन से कराए जाते हैं। इस लेख में हम आसान भाषा में समझेंगे कि EVM क्या है, इसके हिस्से कौन से हैं, यह कैसे काम करती है, भारत में इसका इतिहास क्या रहा और VVPAT का क्या मतलब है।

पूरा नामElectronic Voting Machine
हिंदी नामइलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन
मुख्य हिस्सेबैलेटिंग यूनिट, कंट्रोल यूनिट और VVPAT
निर्माता कंपनियाँBharat Electronics Limited (BEL) और Electronics Corporation of India Limited (ECIL)
पहला सीमित उपयोगमई 1982, केरल की परवूर विधानसभा सीट
देशव्यापी उपयोग2004 का लोकसभा चुनाव
नियंत्रण करने वाली संस्थाभारत निर्वाचन आयोग

EVM क्या है

EVM एक ऐसी इलेक्ट्रॉनिक मशीन है जिसमें मतदाता बटन दबाकर अपना वोट दर्ज करता है। पुराने समय में कागज़ के मतपत्र पर मुहर लगाई जाती थी, फिर पेटी में डाली जाती थी और गिनती हाथ से होती थी। इस प्रक्रिया में समय बहुत लगता था और अवैध या अस्पष्ट मतों की समस्या भी रहती थी। EVM ने मतदान और गिनती दोनों को तेज़ और सरल बनाया।

भारत में उपयोग होने वाली EVM एक स्वतंत्र मशीन है। यह बैटरी से चलती है और इसमें इंटरनेट या किसी नेटवर्क से जुड़ने की सुविधा नहीं होती। निर्वाचन आयोग के अनुसार यही बात इसे नेटवर्क के रास्ते होने वाली छेड़छाड़ से अलग बनाती है। हालाँकि EVM की विश्वसनीयता पर समय-समय पर राजनीतिक बहस होती रही है, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

EVM के मुख्य हिस्से

एक EVM सेट में आमतौर पर तीन इकाइयाँ होती हैं।

  • बैलेटिंग यूनिट (BU): यह वह हिस्सा है जो मतदाता के सामने रखा जाता है। इस पर उम्मीदवारों के नाम, चुनाव चिह्न और नीले बटन होते हैं। मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार के सामने वाला बटन दबाता है।
  • कंट्रोल यूनिट (CU): यह मतदान अधिकारी के पास रहती है और पूरे मतदान को नियंत्रित करती है। वोट इसी में दर्ज और सुरक्षित होते हैं।
  • VVPAT: Voter Verifiable Paper Audit Trail। यह मशीन एक पर्ची छापती है जिसमें उम्मीदवार का क्रम, नाम और चिह्न दिखता है। मतदाता इसे कुछ सेकंड तक एक पारदर्शी खिड़की से देख सकता है, फिर पर्ची सीलबंद डिब्बे में गिर जाती है।

बैलेटिंग यूनिट और कंट्रोल यूनिट एक केबल से जुड़ी होती हैं। बैटरी कंट्रोल यूनिट में लगी होती है, इसलिए बिजली न होने पर भी मतदान जारी रह सकता है।

EVM कैसे काम करती है

मतदान के दिन प्रक्रिया कुछ इस तरह चलती है। मतदाता की पहचान जाँचने और स्याही लगाने के बाद मतदान अधिकारी कंट्रोल यूनिट का बटन दबाता है, जिससे बैलेटिंग यूनिट वोट के लिए तैयार हो जाती है। मतदाता अपने उम्मीदवार के सामने का बटन दबाता है। बटन दबते ही बीप की आवाज़ आती है और VVPAT में पर्ची छपती है। मतदाता पर्ची देखकर पुष्टि कर लेता है कि वोट सही उम्मीदवार को गया है। इसके बाद अगला मतदाता आ सकता है।

मतदान समाप्त होने पर कंट्रोल यूनिट को सील करके सुरक्षित रखा जाता है और मतगणना के दिन उम्मीदवारों के एजेंटों की मौजूदगी में खोला जाता है। गणना में कंट्रोल यूनिट के नतीजे सामने आते हैं। कुछ चुनिंदा मतदान केंद्रों की VVPAT पर्चियों का मिलान भी किया जाता है।

भारत में EVM का इतिहास

EVM का विचार 1970 के दशक के अंत में आया। इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ECIL), हैदराबाद ने 1979 में इसका प्रोटोटाइप बनाया और 1980 में इसे राजनीतिक दलों के सामने प्रदर्शित किया गया। इसके निर्माण में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), बेंगलुरु भी जुड़ा।

मई 1982 में केरल की परवूर विधानसभा सीट के कुछ मतदान केंद्रों पर EVM का पहली बार प्रयोग हुआ। बाद में उस चुनाव को अदालत में चुनौती मिली, क्योंकि तब EVM के उपयोग के लिए कोई स्पष्ट क़ानून नहीं था। इसके बाद 1989 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन करके EVM को क़ानूनी आधार दिया गया।

धीरे-धीरे अलग-अलग राज्यों में उपयोग बढ़ा और वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में पूरे देश की सभी सीटों पर EVM से मतदान हुआ। तब से यही व्यवस्था चल रही है।

VVPAT का आना

EVM पर भरोसा बढ़ाने के लिए VVPAT की व्यवस्था जोड़ी गई। चुनाव संचालन नियमों में अगस्त 2013 में संशोधन हुआ और सितंबर 2013 में नागालैंड के नोकसेन विधानसभा उपचुनाव में VVPAT का पहली बार प्रयोग हुआ। बाद में इसका दायरा बढ़ता गया। वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि हर विधानसभा क्षेत्र में पाँच चुनिंदा EVM की VVPAT पर्चियों का मिलान किया जाए। इस विषय पर आगे भी अदालती सुनवाइयाँ होती रही हैं।

EVM के फायदे और उठने वाले सवाल

फायदे: मतगणना कुछ घंटों में पूरी हो जाती है, अवैध मतों की समस्या लगभग ख़त्म हो जाती है, काग़ज़ की भारी खपत घटती है और मतपेटी लूट जैसी घटनाओं पर रोक लगाने में मदद मिलती है। मशीन को ले जाना और रखना भी आसान है।

बहस और सवाल: कई राजनीतिक दल और कार्यकर्ता समय-समय पर EVM की सुरक्षा पर सवाल उठाते रहे हैं। निर्वाचन आयोग का पक्ष है कि मशीन में वायरलेस या वायर्ड नेटवर्क नहीं है, उसका सॉफ़्टवेयर निर्माण के समय ही लिखा जाता है और कई स्तरों पर परीक्षण तथा सीलिंग होती है। न्यायालयों में भी यह मुद्दा कई बार पहुँचा है। एक जागरूक पाठक के रूप में सबसे अच्छा तरीका है कि आप आधिकारिक स्रोतों और अदालती फ़ैसलों को पढ़ें।

मतदाता के रूप में अपना नाम सूची में जाँचना भी उतना ही ज़रूरी है। इसके लिए हमारा लेख वोटर आईडी स्टेटस ऑनलाइन कैसे चेक करें पढ़ें। दूसरे शब्दों के अर्थ जानने के लिए फुल फॉर्म की पूरी सूची देखें।

EVM से जुड़े कुछ और शब्द

चुनाव की ख़बरों में कुछ और शब्द भी आते हैं। NOTA का मतलब None Of The Above है, यानी उपरोक्त में से कोई नहीं। यह विकल्प भी EVM पर अंतिम बटन के रूप में दिया जाता है, ताकि मतदाता किसी भी उम्मीदवार को न चुनने का अपना मत दर्ज कर सके। मतदान केंद्र वह जगह है जहाँ मतदाता वोट डालते हैं, और मतगणना केंद्र वह जगह है जहाँ सभी कंट्रोल यूनिट की गिनती होती है। मतदान से पहले और बाद में मशीनों की सीलिंग उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के सामने की जाती है, ताकि प्रक्रिया पारदर्शी रहे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

EVM का फुल फॉर्म क्या है?

EVM का फुल फॉर्म Electronic Voting Machine है। हिंदी में इसे इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन कहते हैं।

EVM में कौन-कौन से हिस्से होते हैं?

मुख्य रूप से बैलेटिंग यूनिट, कंट्रोल यूनिट और VVPAT। बैलेटिंग यूनिट मतदाता के लिए है और कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास रहती है।

VVPAT का फुल फॉर्म क्या है?

VVPAT का फुल फॉर्म Voter Verifiable Paper Audit Trail है। यह एक पर्ची छापकर मतदाता को दिखाती है कि उसका वोट किसे गया।

भारत में EVM का पहली बार उपयोग कब हुआ?

मई 1982 में केरल की परवूर विधानसभा सीट के कुछ मतदान केंद्रों पर। देशव्यापी उपयोग 2004 के लोकसभा चुनाव में हुआ।

EVM कौन बनाता है?

भारत में EVM का निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ BEL (भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड) और ECIL (इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) करती हैं।

क्या EVM इंटरनेट से जुड़ी होती है?

निर्वाचन आयोग के अनुसार नहीं। EVM एक स्वतंत्र, बैटरी से चलने वाली मशीन है जिसमें इंटरनेट या अन्य नेटवर्क से जुड़ने की सुविधा नहीं होती।

EVM चलाने के लिए बिजली चाहिए?

नहीं, यह बैटरी से चलती है, इसलिए बिजली न होने पर भी मतदान हो सकता है।

EVM को क़ानूनी मान्यता कब मिली?

वर्ष 1989 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन करके EVM के उपयोग को क़ानूनी आधार दिया गया।

निष्कर्ष

EVM यानी Electronic Voting Machine ने भारत में चुनाव प्रक्रिया को तेज़, सरल और व्यवस्थित बनाया है। VVPAT के जुड़ने से मतदाता को अपने वोट की पुष्टि का मौका भी मिला। चुनाव से जुड़ी ताज़ा और प्रामाणिक जानकारी के लिए भारत निर्वाचन आयोग की वेबसाइट देखें।