गायत्री माता की आरती का हिंदी शीर्षक चित्र

गायत्री माता की आरती | जयति जय गायत्री माता Lyrics, अर्थ और विधि

गायत्री माता की आरती क्या है

गायत्री माता को वेदमाता कहा जाता है। परंपरा में माना जाता है कि ज्ञान, विवेक और शुद्ध बुद्धि की प्रार्थना उन्हीं से की जाती है। उनकी स्तुति में जो आरती सबसे ज़्यादा गाई जाती है, उसका पहला चरण है “जयति जय गायत्री माता”। इस आरती की खासियत यह है कि इसमें माँ को अनेक नामों और रूपों में याद किया गया है, कहीं आदिशक्ति, कहीं सावित्री, कहीं सरस्वती और लक्ष्मी के स्वरूप में।

इस आरती का मूल अनुरोध बहुत सीधा है: “सत् मारग पर हमें चलाओ।” यानी हे माता, हमें सही रास्ते पर ले चलो। इसी वजह से विद्यार्थी, साधक और सामान्य गृहस्थ, सब इसे अपने ढंग से गाते हैं। इस पोस्ट में आरती के पूरे बोल, सरल अर्थ, गाने की विधि और जरूरी सवालों के जवाब दिए गए हैं। गायत्री माता से जुड़ी चालीसा पढ़ने के लिए हमारी श्री गायत्री चालीसा वाली पोस्ट देखें।

जयति जय गायत्री माता: आरती के पूरे बोल

आरती का क्रम नीचे दिया गया है। हर पद के बाद टेक “जयति जय गायत्री माता” दोहराई जाती है।

जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता।
सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

आदि शक्ति तुम अलख निरंजन जगपालक कर्त्री।
दुःख शोक, भय, क्लेश कलश दारिद्र दैन्य हत्री॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

ब्रह्म रूपिणी, प्रणत पालिन जगत धातृ अम्बे।
भव भयहारी, जन-हितकारी, सुखदा जगदम्बे॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

भय हारिणी, भवतारिणी, अनघे अज आनन्द राशि।
अविकारी, अखहरी, अविचलित, अमले, अविनाशी॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

कामधेनु सतचित आनन्द जय गंगा गीता।
सविता की शाश्वती, शक्ति तुम सावित्री सीता॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

ऋग, यजु साम, अथर्व प्रणयनी, प्रणव महामहिमे।
कुण्डलिनी सहस्त्र सुषुम्न शोभा गुण गरिमे॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

स्वाहा, स्वधा, शची ब्रह्माणी राधा रुद्राणी।
जय सतरूपा, वाणी, विद्या, कमला कल्याणी॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

जननी हम हैं दीन-हीन, दुःख-दरिद्र के घेरे।
यदपि कुटिल, कपटी कपूत तउ बालक हैं तेरे॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

स्नेहसनी करुणामय माता चरण शरण दीजै।
बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे दया दृष्टि कीजै॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ, दुर्भाव द्वेष हरिये।
शुद्ध बुद्धि निष्पाप हृदय मन को पवित्र करिये॥
॥ जयति जय गायत्री माता ॥

जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता।
सत् मारग पर हमें चलाओ, जो है सुखदाता॥

नोट: जिन पुस्तिकाओं और साइटों से मिलान किया गया, उनमें पाठ लगभग एक जैसा मिला। फिर भी कुछ शब्द अलग छपे हो सकते हैं, जैसे चौथे पद की “अखहरी” को कई जगह “अघहारी” पढ़ा जाता है, और छठे पद में “सुषुम्न” की जगह “सुषुमन” भी मिलता है। अपनी पूजा-पुस्तिका या परंपरा वाला पाठ ही गाएँ।

आरती का सरल अर्थ

पहला पद: भक्त कहता है कि हे गायत्री माता, आपकी जय हो। आप हमें सत्य और धर्म के मार्ग पर चलाइए, क्योंकि वही मार्ग सुख देने वाला है।

दूसरा पद: माँ को आदिशक्ति कहा गया है, जो अदृश्य और निर्विकार भी हैं और संसार का पालन भी करती हैं। उनसे दुःख, शोक, भय, क्लेश, गरीबी और दीनता को दूर करने की प्रार्थना की गई है।

तीसरा और चौथा पद: यहाँ माता को ब्रह्मरूपिणी, शरणागत की रक्षक, जगत की धात्री और संसार के भय से तारने वाली कहा गया है। साथ ही उन्हें निर्दोष, आनंद का भंडार, अविकारी और अविनाशी बताया गया है। भाव यह है कि वे ऐसी शक्ति हैं जो बदलती नहीं और भक्त को स्थिरता देती हैं।

पाँचवाँ पद: कामधेनु को इच्छाएँ पूरी करने वाली गाय माना जाता है। यहाँ माँ की तुलना कामधेनु, गंगा, गीता और सावित्री-सीता जैसे पवित्र प्रतीकों से की गई है, ताकि भक्त के मन में माँ की व्यापकता का चित्र बने।

छठा पद: माँ को चारों वेदों को प्रेरित करने वाली और प्रणव यानी ओंकार की महिमा से जुड़ी बताया गया है। कुंडलिनी और सुषुम्ना का उल्लेख योग-साधना की परंपरा की ओर इशारा करता है।

सातवाँ पद: इसमें स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा, रुद्राणी, वाणी, विद्या और कमला जैसे अनेक नाम आते हैं। संदेश यह है कि अलग-अलग रूपों में पूजी जाने वाली दिव्य शक्तियाँ अंततः एक ही माँ का विस्तार मानी गई हैं।

आठवें से दसवें पद: ये तीन पद प्रार्थना हैं। भक्त मानता है कि हम दीन हैं, गलतियाँ भी करते हैं, फिर भी आपके बालक हैं। इसलिए दया की दृष्टि रखिए और काम, क्रोध, मद, लोभ, घमंड और द्वेष जैसे दोषों को दूर करके बुद्धि शुद्ध और हृदय पवित्र कीजिए।

गायत्री माता से जुड़ा भाव

गायत्री मंत्र ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र है और इसे सविता देवता की उपासना से जोड़ा जाता है। परंपरा में गायत्री को मंत्र की अधिष्ठात्री देवी के रूप में माता कहा गया। कई ग्रंथों और लोक मान्यताओं में उन्हें पाँच मुख वाली और अलग-अलग शक्तियों से जुड़ी बताया गया है, लेकिन चित्रण और ब्योरे अलग परंपराओं में अलग हैं। गायत्री जयंती की तिथि भी सभी जगह एक जैसी नहीं मानी जाती, इसलिए स्थानीय पंचांग या अपने परिवार की परंपरा देखें।

आरती का असली भाव बुद्धि की शुद्धि है। यहाँ किसी चमत्कार का वादा नहीं, बल्कि स्वभाव सुधारने की प्रार्थना है। काम, क्रोध, लोभ जैसे दोष घटें, तो घर-परिवार और काम-काज में अपने आप शांति आती है। यही कारण है कि यह आरती सुबह के समय विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों में लोकप्रिय है। धन-संपदा की देवी की उपासना पसंद हो तो लक्ष्मी जी की आरती भी देख सकते हैं।

गायत्री माता की आरती कब और कैसे करें

गायत्री उपासना के लिए प्रातःकाल सबसे अच्छा समय माना जाता है, खासकर सूर्योदय के आसपास। संध्या काल में भी आरती की जाती है। रविवार को गायत्री माता की पूजा करने की परंपरा कई परिवारों में है, और गायत्री जयंती तथा नवरात्र में विशेष पूजन होता है।

  • स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • माता के चित्र या मूर्ति के सामने घी का दीपक जलाएँ। पीले या सफ़ेद फूल चढ़ाएँ।
  • मन शांत करके तीन बार गायत्री मंत्र का स्मरण करें।
  • धीमे सुर में ऊपर लिखी आरती गाते हुए थाली घुमाएँ।
  • अंत में जल या प्रसाद ग्रहण करें और घर में सबको बाँटें।

नियम से अधिक भाव को महत्व दिया जाता है। अगर किसी दिन सब सामग्री न हो, तब भी दीपक और स्वच्छ मन से आरती की जा सकती है।

आरती पाठ के लाभ (मान्यता)

  • मान्यता है कि नियम से आरती गाने पर मन एकाग्र होता है और विचार शुद्ध रहते हैं।
  • कहा जाता है कि माँ गायत्री की उपासना से बुद्धि और विवेक को बल मिलता है।
  • प्रातः यह पाठ करने से दिन की शुरुआत शांत और सकारात्मक होती है, ऐसा श्रद्धालु अनुभव बताते हैं।
  • परिवार साथ बैठकर आरती गाए, तो आपसी जुड़ाव भी बढ़ता है।

ये सभी बातें आस्था पर आधारित हैं। पढ़ाई, स्वास्थ्य या करियर के लिए मेहनत और उचित सलाह का स्थान कोई पाठ नहीं ले सकता।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

गायत्री माता की आरती कितनी लंबी है?

इसमें दस पद हैं और टेक के साथ गाने में तीन से चार मिनट लगते हैं।

क्या गायत्री आरती हर कोई कर सकता है?

आरती गाने पर कोई रोक नहीं मानी जाती। कोई भी श्रद्धालु इसे श्रद्धा से गा सकता है। गायत्री मंत्र के जप से जुड़े नियम अलग-अलग परंपराओं में अलग बताए जाते हैं, उन्हें अपने गुरु या परिवार से समझ लें।

गायत्री माता की आरती किस दिन करें?

रोज़ की जा सकती है। रविवार, गायत्री जयंती और नवरात्र में विशेष रूप से करने की परंपरा है।

आरती और चालीसा में क्या फ़र्क़ है?

आरती दीपक घुमाते हुए गाई जाने वाली संक्षिप्त स्तुति है, जबकि चालीसा चालीस चौपाइयों की लंबी स्तुति होती है। दोनों अपनी जगह पूजा का हिस्सा हैं।

क्या आरती के साथ मंत्र भी बोलना चाहिए?

बहुत से लोग आरती से पहले गायत्री मंत्र का स्मरण करते हैं। यह वैकल्पिक है।