गजानन माधव मुक्तिबोध (जन्म: 13 नवंबर 1917, श्योपुर, ग्वालियर रियासत, अब मध्य प्रदेश; निधन: 11 सितंबर 1964, नई दिल्ली) हिंदी की नई कविता और प्रगतिशील काव्य-धारा के सबसे गहरे और चुनौतीपूर्ण कवियों में गिने जाते हैं। उनके जीवनकाल में उनका कोई स्वतंत्र काव्य-संग्रह प्रकाशित नहीं हो सका, पर निधन के बाद ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ ने उन्हें हिंदी कविता के शिखर पर पहुँचा दिया। लंबी कविता, फैंटेसी और आत्मसंघर्ष उनकी पहचान हैं। ‘अँधेरे में’, ‘ब्रह्मराक्षस’ और ‘तारसप्तक’ से जुड़े प्रश्न परीक्षा में बार-बार आते हैं। नीचे उनका जीवन, रचनाएँ और परीक्षा-उपयोगी तथ्य दिए गए हैं।
एक नज़र में
| पूरा नाम | गजानन माधव मुक्तिबोध |
| जन्म | 13 नवंबर 1917 |
| जन्मस्थान | श्योपुर (ग्वालियर क्षेत्र), मध्य प्रदेश |
| निधन | 11 सितंबर 1964, नई दिल्ली |
| विधा | कविता, कहानी, आलोचना, निबंध |
| काव्य-धारा | प्रगतिवाद से नई कविता तक का सेतु; प्रयोगवाद से भी संबद्ध |
| प्रसिद्ध कविता | अँधेरे में, ब्रह्मराक्षस |
| प्रसिद्ध काव्य-संग्रह | चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964) |
जीवन परिचय
मुक्तिबोध का जन्म एक मराठीभाषी परिवार में हुआ। उनके पिता पुलिस विभाग में उप-निरीक्षक थे, इसलिए परिवार को बार-बार स्थानांतरण झेलना पड़ा और बचपन की पढ़ाई टुकड़ों में हुई। उनके छोटे भाई शरच्चंद्र मुक्तिबोध मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार हुए। जन्मस्थान को लेकर कुछ स्रोत श्योपुर बताते हैं, तो कुछ ग्वालियर क्षेत्र का कोई गाँव; अधिकांश आधुनिक स्रोत श्योपुर को ही मानते हैं।
उन्होंने उज्जैन और इंदौर में पढ़ाई की। कुछ स्रोतों के अनुसार 1938 में इंदौर के होलकर कॉलेज से बी.ए. करने के बाद वे अध्यापन में लगे और बाद में नागपुर से एम.ए. किया। जीवन की रोज़ी के लिए उन्होंने उज्जैन, शुजालपुर, कलकत्ता, बंबई, बनारस जैसी जगहों में काम किया। नागपुर में करीब दस वर्ष रहकर उन्होंने आकाशवाणी और पत्र-पत्रिकाओं के लिए काम किया। अंतिम वर्षों में वे छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव के एक कॉलेज में पढ़ाते थे।
मुक्तिबोध मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहे। आर्थिक कठिनाइयाँ, बीमारी और अपनी रचनाओं को छपवाने का संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा रहा। राजनांदगाँव में उन्हें लकवे का आघात हुआ, इलाज के लिए उन्हें दिल्ली ले जाया गया और वहीं 11 सितंबर 1964 को मात्र 46 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
प्रमुख रचनाएँ
- कविता-संग्रह: चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964), भूरी-भूरी खाक धूल
- लंबी कविताएँ: अँधेरे में, ब्रह्मराक्षस
- कहानी-संग्रह: काठ का सपना, सतह से उठता आदमी
- उपन्यास: विपात्र
- आलोचना/निबंध: कामायनी: एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ, एक साहित्यिक की डायरी
- रचनावली: मुक्तिबोध रचनावली (6 खंड, नेमिचंद्र जैन द्वारा संपादित)
उनकी कविता ‘अँधेरे में’ को हिंदी की सबसे महत्त्वपूर्ण लंबी कविताओं में गिना जाता है। उसमें व्यक्ति के भीतर चल रहे द्वंद्व, सत्ता के भय और सामाजिक अन्याय का स्वप्न-चित्रों के सहारे चित्रण है।
मुक्तिबोध की कठिनाई उनकी ईमानदारी से पैदा होती है। वे मानते थे कि लेखक को अपने भीतर के अंतर्विरोधों से बचना नहीं, उनसे जूझना चाहिए। इसी कारण उनकी कविताएँ पाठक को आराम नहीं देतीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करती हैं। जीवन में उन्हें व्यापक मान्यता नहीं मिली, पर उनके निधन के बाद नई पीढ़ी के कवियों और आलोचकों ने उन्हें अपना मार्गदर्शक माना। आज वे हिंदी कविता में बौद्धिक साहस और नैतिक बेचैनी के प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं।
भाषा-शैली और साहित्यिक विशेषताएँ
- उनकी कविता में फैंटेसी का बड़ा स्थान है; वे यथार्थ को सीधे कहने की जगह स्वप्न-चित्रों और रहस्यमय बिंबों से व्यक्त करते हैं।
- लंबी कविता उनका प्रिय रूप है, जिसमें विचार और अनुभव धीरे-धीरे परत-दर-परत खुलते हैं।
- भाषा तत्सम, उर्दू और बोलचाल के शब्दों का कठिन मगर प्रभावशाली मेल है।
- मार्क्सवाद और अस्तित्व-चिंतन, दोनों का असर उनके मध्यवर्गीय आत्मसंघर्ष में दिखता है।
- निबंध ‘तीसरा क्षण’ में उन्होंने सृजन-प्रक्रिया को तीन चरणों में समझाया।
- वे आलोचक के रूप में भी सैद्धांतिक गंभीरता के लिए जाने जाते हैं।
पुरस्कार और सम्मान
जिन स्रोतों को जाँचा गया, उनमें मुक्तिबोध को जीवनकाल में मिले किसी बड़े पुरस्कार का उल्लेख नहीं मिलता। उनकी स्मृति में मध्य प्रदेश साहित्य परिषद द्वारा ‘मुक्तिबोध पुरस्कार’ दिया जाता है। उनकी असली प्रतिष्ठा मरणोपरांत बनी।
परीक्षा के लिए जरूरी तथ्य
- मुक्तिबोध प्रगतिवाद और नई कविता के बीच का सेतु माने जाते हैं।
- वे 1943 के ‘तारसप्तक’ के कवियों में शामिल थे।
- ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ उनकी प्रसिद्ध काव्य-कृति है, जो 1964 में प्रकाशित हुई।
- ‘अँधेरे में’ और ‘ब्रह्मराक्षस’ उनकी प्रसिद्ध लंबी कविताएँ हैं।
- ‘कामायनी: एक पुनर्विचार’ जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ की आलोचना है।
- उनकी कविता में फैंटेसी शिल्प की मुख्य विशेषता है।
- जन्म: 13 नवंबर 1917; निधन: 11 सितंबर 1964।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
मुक्तिबोध का जन्म कहाँ हुआ था?
अधिकांश स्रोतों के अनुसार उनका जन्म श्योपुर (ग्वालियर क्षेत्र, मध्य प्रदेश) में हुआ। कुछ स्रोतों में स्थान का वर्णन अलग शब्दों में मिलता है।
मुक्तिबोध की सबसे प्रसिद्ध कविता कौन सी है?
उनकी सबसे चर्चित कविता ‘अँधेरे में’ मानी जाती है। ‘ब्रह्मराक्षस’ भी बहुत प्रसिद्ध है।
‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ कब प्रकाशित हुआ?
यह संग्रह 1964 में, उनके जीवन के अंतिम दिनों के आसपास प्रकाशित हुआ। यह उनका पहला प्रमुख काव्य-संग्रह माना जाता है।
मुक्तिबोध किस काव्य-धारा से जुड़े हैं?
वे प्रगतिशील कविता और नई कविता के बीच की कड़ी माने जाते हैं, और तारसप्तक में शामिल होने के कारण प्रयोगवाद से भी जुड़े हैं।
स्रोत
- Wikipedia: Gajanan Madhav Muktibodh
- भारतकोश: मुक्तिबोध
- Frances Pritchett: Muktibodh biographical note
अंतिम जाँच: 16 अक्टूबर 2026